हिंदी पत्रकरिता के क्षेत्र में समकालीन बुiद्वजीवी का जीक्र आते है तो वह प्रभश जोशी के बीना पूर्ण नही हो सकता . कही न कही ऐकांकीपन बना रहेगा । अपने पॉच दशको से अधिक के पत्रकार जीवन में पत्रकार -संपादक प्रभाश जोशी ने शायद ही कोई ऐसा विशय हो. जिस पर उनकी कलम ने धार -दार प्रहार न किया हो । राजनीति और राजनेता ,खेल और क्रिकेट और टेनिस ,धर्म ,समाज सांप्रदायिक ,नदी ,पर्यावरण जैसे तमाम विशयों पर उनका गहरा अध्ययन था । इन्ही विशयों पर वे समयिकता के हिसाब से `कगद कारे `करते रहते थे, लेकिन किक्रेट का उनपर नशा छाया रहता था इससे वह दिवानगी के हद से जुडे थें . और सचिन के क्रिकेट से इस तरह अभिभूत थे कि एक बार उन पर `आह सचिन ,वाह सचिन , शीशZक से उन्होने जनसता के मुख्यपृश्ठ पर एक भारी भरकम लेख भी लिखा था , जिस तरह गुरूवार को हैदरावाद में175 रनों की शानदार पारी खेल कर 17000 हजार रनों का रिकार्ड बनाकर सचिन तेंदुलकर आउट हुए उसी तरह प्रभाश जोशी भी हिन्दी पत्रकारिता और समाजिक संप्रेशण के शानदार पारी खेल कर लगभग उसी समय पवेलियन लौट गए , सचिन के जबदस्त खेल के बावजूद भारत हार गया , वैसे ही इस देश के गरीबों किसानों ,आदिवासियों एवं आमजनों के पक्ष में धाराप्रवाह लेखन ,संवाद और संघशZ के बावजूद प्रभाश जोशी की टीम जीत से बहुत दूर है .
जोशी का जन्म 15 जुलाई 1936 को मध्य प्रदेश में इंदौर और भोपाल के बीच पार्वती नदी के किनारें बडवा में हुआ था , उन्होने प्रारंभिक िशक्षा इंदौर के प्रथमिक स्कूल से और महाराजा िशवाजी राव मिडिल स्कूल से मैट्रीक तक की िशक्षा ग्रहण की उसके बाद उन्होने होस्कर कॉलेज गुजराती कॉलेज और फिर क्रिश्रियन कालेज में आगे की पढाई की गांवों में रहते हुए उन्होने हिन्दी और अंग्रेजी भाशाओं के माध्यम से दुनिया का साहित्य भी पढा , उन्होने पत्रकार जीवन की शुरूआत नई दुनिया अखबार से की ।
श्री जोशी ने छह: बरस तक पत्राकारिता और साहित्य में लिखने का सघन प्रिशक्षण भी लिया था । 1966 में आकर शरद जोशी के साथ नया दैनिक माध्यप्रदेश निकाला और दो साल बाद गांधी शताब्दी समिति के प्रकाशनों की जिम्मेदारी लेकर दिल्ली आ गयें लोकनायक जयप्रकाश के संपर्क में आने पर वह उन से बहुत प्रभावित हुए तथा 1972 में चंबल कें डाकुओं में आत्मसमर्पण कें काम में उनके साथ सहयोग किया , फिर उनके साथ साप्ताहिक ,एवं एवरीमैंस तथा गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलन से जुडे ।
1974 में श्री जोशी ने प्रज्ञानीति नामक साप्ताहिक का संपादन किया , पर इमरजेंसी लगने के बाद उसे बंद करना पडा , उसके बाद उन्होंने `आस -पास ` साप्ताहिक का संपादन किया पर उसे भी बंद कर दिया जनवरी 1978 से अपैल 1981तक इंडियन एक्सप्रेस के साथ जुडे रहने के बाद नवबंर 1983 में इसी समूह के लिये हिन्दी दैनिक जनसता की शुरूआत की उनके अथक प्रयासों और उनके सहयोगियों के कठिन परिश्रम की बदौलत इस अखबार ने पहले ही साल दो लाख 32 हजार पाठक बना लियें इसके बाद 1987 में चंण्डीगढ 1988 में मुम्बई और 1991में कोलकता से जनसता के संस्करण निकाले अपनी बढती आयु एवं अवस्थता के कारण श्री जोशी की 1994 में बुम्बई मं बाईपास सर्जरी हुई
स्वस्थय कारणों से ही नवबंर 1995 में उन्होंने जनसता के प्रधान संपादक का पद छोडा और संपादकीय सलाहकार की भूमिका में आ गये लेकिन बाद में इससे भी मुक्त हों गये उनकी प्रमुख प्रकािशत पुस्तके है चम्बल की बन्दूके गांधी के चरणों में और हिन्दी होने का धर्म , वह कई पत्रकार संगठनों से भी जुडे थे और पूरी तरह सक्रिय रहकर देश भर में भ्रमण कर युवा पत्रकारों का मार्ग दशन कर रहे थें । हिन्द स्वराज्य के शताब्दी वशZ में वे नई व्याख्या लिख रहे थे । लोकतंत्र और पत्रकारिता के तमाम अधूरे कामों के साथ वे बडा निर्वात छोड गए है । अगर समाज की जरूरत होगी तों वह अपना प्रभाश जोशी पैदा करेगा , उनके जाने पर दुखी होने की नही उनके काम पर गर्व करने का समय है , एक महान संपादक का शत-शत प्रणाम ।

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