तुमने मुझे कभी
मुडकर दोबारा
नही देखा
हालांकि तुम
घूरते हर लडकी को बार-बार
हें कृष्ण!
तुम मेरे सामने आते ही
भीष्म पितामह
क्यों हो जाते हो?
तुमने कभी नही की
मेरी तारीफ
जबकि दूसरी लडकियों की शान में
गढे न जाने कितने कसीदे
वे गाती हैं तो
पायलों की मधुर झंकार
और मै गाती हूं तो
सदी का पूरा दर्द !
अब तुम्ही बताओगें
या मैं बता दूं ये फर्क क्यों है ?
ख्ौर! तुम क्या बताओगें
तुमने तो यह भी नही बताया कि
जब पढाती होती हूं
क्लास में
तो बच्चों की आंखें
विश्वास से कितनी भर जाती है
पिता के हाथों में जब
रखती है अपनी तनख्वाह
तो वे अब भी फूले नही समाते हैं
माँ मुझे अक्सर बेटा कहकर दुलराती है
(हालांकि यह मुझे अजीब लगता है ।)
मै भी कर सकती हूं बात
फैशन ,बिग , बॉस के वॉच और
सेक्सी वाइक्स की
मेरे ठेगे से गर कोई
सोचे मुझे बुरा
पर ताड सकती हूं
मैभी
हैडसम छोकरों को
तुम्हे से सारी चीजे
नही दिखतीं क्योंकि
मेरी चमडी के रंग का
कालापन कब का
तुम्हारी आंखों में
उतर गया है ।
अतिम कुमार
साभार हंस फरवरी 2009
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