
ग़ज़ल 2000
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये बशीर बद्र
हमने इक शाम चराग़ों से सजा रक्खी है
शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रक्खी है
वाली आसी
दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है
चले आओ जहाँ तक रौशनी मालूम होती है
नुशूर वाहिदी
मुझसे मत जी को लगाओ कि नहीं रहने का
मैं मुसाफिर हूँ कोई दिन को चला जाऊँगा
मुहम्मद मीर सोज़
आज सोचा तो आँसू भर आये
मुद्दतें हो गईं मुस्कराये
कैफ़ी आज़मी
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