नशे की दलदल में फस कर कैसे नौजवान अपनी ङ्क्षजन्दगी तबाह कर रहे हैं, पंजाब सरकार के ही आंकड़ों पर नजर मारी जाए तो 70 फीसदी नौजवान नशे के आदी हो चुके हैं जिन्में 22' लड़कियों की भी संख्या शामिल है। पंजाब में पांचवे दरिया के नाम पर नशों का कारोबार चल रहा है, अकाली भाजपा गठबंधन की पिछली सरकार के दौरान 10 वर्षों में नशेड़ी नौजवानों की संख्या 38' से बढक़र 78' तक हो चुकी है। पंजाब में बढ़ रहे नशे के कारोबार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अपनी ङ्क्षचता व्यक्त की है, सरकार की लाख कोशिशें के बावजूद भी नशा तस्करी पर विराम नहीं लग सका। वर्तमान कांग्रेस सरकार ने चुनावों से पहले वायदा किया था कि वह 4 सप्ताह में पंजाब से नशा बिलकुल खत्म कर देंगे जिसके लिए प्रदेश के मुख्य मंत्री कैप्टन अमङ्क्षरद्र ङ्क्षसह ने जोर शोर से प्रयास भी किए परन्तु सफलता हाथ नहीं लगी। नशा तस्करों की जड़ें इस कदर मजबूत हो चुकी हैं कि सरकार चाहे तो भी इसे रोक नहीं पाएगी। पंजाब के लोग अब सोचने पर मजबूर हैं कि नशे से कब निजात मिलेगी क्योंकि इससे परिवार तो तबाह हो रहे हैं जबकि अपराध भी लगातार बढ़ रहे हैं। देखा जाए तो नशा ही अपराधों की जननी है।नशे से विवाहित जीवन बर्बाद हो रहा है, शादी के कुछ महीने बाद ही नशे का सेवन करने वालों की नौवत तलाक तक पहुंच जाती है ऐसे में तलाक के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। महिला थानों में तलाक को लेकर दोनों परिवारों के आपस में झगडऩें की बात आम है, देखा जाए तो सुबह 9 बजे से लेकर सांय 5 बजे तक तलाक के मामलों का ही बोलबाला रहता है।
नशे के पीछे विदेशी ताकतें
शहर में नशा तस्कर गिरोह के जाल इतने मजूबत है कि आए दिन नशा तस्कर की गिरफतारी और पुलिस को छापेमारी के बावजूद भी इनका नेटवर्क खत्म होने के नाम नही ले रहा है। हालांकि पुलिस यह दावा करती है कि नशा तस्करी पर जल्द ही काबू पा लेगे लेकिन इस गिरोह के सक्रियता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि ये तस्कर पुलिस के गले की हडडी बन बैठै। कही ऐसा तो नही कि तस्कर पुलिस प्रसाशन से मिलकर ये सारा खेल खेला जा रहा है और दिखावे कि लिए एक दो तस्कर को गिरफतार करके अपनी सक्रियाता का सबूत सबके सामने पेश करते रहते है। यह एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है । आज नशा के कारोबार अरबों के आकड़े से भी उपर चला गया है और इनका नेटवर्क देश -विदेश से जुडा़ हुआ है। इसक खुलासा पिछले साल तब हुआ जब एक नाइजीरिया मुल के व्यक्ति को एन.आई ने बठिंडा में गिरफतार किया, इतना बडा़ कारोबार प्रसाशन के मिलीभुगत के बगैर कैसे संभव है । नशे संबंधी तथ्य उभर कर सामने आ रहे है कि इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है।पाकिस्तान से लेकर अफरीका के नाइजीरिया तक नशे का कारोबार होता है जबकि इसकी बिक्री का सबसे बड़ा केंद्र हमारा देश है। जन्संख्या के लिहाज से हर वर्ष देश में 2 लाख करोड़ रुपए का नशा विक जाता है जिससे देश की आर्थिक स्थिति भी कमजोर होती है।
हरियाणा से तस्करी कर शराब पहुंच रही है पंजाब में
पंजाब में शराब के भाव आसमान छूने लगे हैं जो आम गरीब की पहुंच से बाहर हैं नशे की आपूर्ति के लिए सस्ता नशा तस्क री को अंजाम दे रहा है। रोजाना ऐसे कई मामले पुलिस की ग्रिफ्त में आए जिन्में शराब हरियाणा से तस्कर कर लाई जा रही है। पंजाब के डी.जी.पी. ने पड़ोसी राज्यों राजस्थान व हरियाणा के डी.जी.पी. से तालमेल कर नशे व शराब को रोकने की कोशिश की लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी। हरियाणा में शराब सस्ती होने के कारण धडल्ले से इसकी बिक्री पंजाब में हो रही है जिससे पंजाब के ठेकेदारों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
शराब के मामले में पड़ोसी राज्यो से सटे जिले ज्यादा प्रभावित हो रहे । इसी वजह से पड़ोसी राज्य हरियाण से बठिंडा में नशे की स्पलाई ज्यादा मात्रा में होता है क्योंकि हरियाणा में कम दाम पर शराब आसानी से मिल जाते है और यहां लाकर दोगुने से भी ज्यादा दाम पर बेचते है । इस कारण शहर में नशे पर कंट्रोल करना मुश्क्लि हो गया है। आये दिन हरियाण में तैयार शराब की पेटियां बरामद की जाती हैं लेकिन कानून में मिली राहत के कारण तुरंत जमानत पर छूट कर तस्कर इस धंधे में फिर लग जाते हैं।
शहर में क्राइम का कारण नशा पंजाब ओपिओइड अडिक्शन सर्वे ने 2015 में एक सर्वे कराया था जिसमें 22 जिलों के 3628 नशे से प्रभावित व्यक्ति को अध्ययन में शामिल किया था । जिसमें 76 प्रतिशत की आयु18 से 35 वर्ष के बीच है, जिसमें 99 प्रतिशत पुरूषों में 54 प्रतिशत अविवाहित है। कु ल प्रतिशत का 27 प्रतिशत अकुशल नौजवान नशे के चपेट में है ,इस कारण ही शहर में आए दिन छोटी -मोटी क्र ाईम क ी जो घटनाए हो रही है, इसके पीछे भी कही न कही नशा का व्यपार ही जिम्मेदार है,क्योंकि नशेडी के पास पैसा नही होता तब ऐसी छोटी मोटी चोरी कर के नशा के लिए पैसा का इंतजाम करते है । इस तरह से नशा शहर में आतंकवाद के तरह काम कर रहा है
नशे के कारण तलाक के मामले बढ़े
नशे ने परिवार के तानेबाने को तबाह कर के रख दिया है,नशे की मार सबसे ज्यादा महिला बुजुर्ग और बच्चों को उठानी पर रही है इसकी वजह से तलाक के मामलों में भी इजाफा हो गया है । क्योकि नशे के शिकार नौवजवान काम करने के लायक नही रह जाता और उसका औसतन 500 से 1500 रूपये के रोज नशा करने के आदि हो जाता है । धीरे -धीरे पैसा खत्म हो जाता है तो वह अपने घर के समान बेचकर नशा करने लगता है वो भी खत्म हो जाता है तब वह जमीन -जायदात बेच कर नशा करने लगता है परिवार के सदस्य के विरोध करने पर मारपीट करने पर उतारू हो जाता है । इस तरह उसका पुरा परिवार ही तबाह हो जाता है ।
नशे करने में महिंलाए भी पीछे नही
एक समय था जब महिलाएं घूघट में रहती थी लेकिन अब उनका सोचने का दायरा व्यापक हो गया है अब महिलाएं भी नशा करने के मामले में पुरूषों से पीछे नही है, भले ही उनका प्रतिशत कम रहा हो, इतना ही नही नशे के कारोबार में भी काफी सक्रिय है । वह खुद नशा बेचने का काम करती है। आम तौर देखा गया है कि रेव पार्टी में अधिकतर महिलाओं की संख्या पुरषों के बराबर होती है। महांनगरों में पुलिस द्वारा छापामारी के बावजूद रेव पार्टी बंद नहीं हुई। रेव पार्टी के प्रबंधक मोटी रकम ऐंठ कर अमीर घराने के लडक़े व लड़कियों को फंसाते हैं और उन्हें महंगे से महंगा नशा तक सप्लाई करते हैं जिसके लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। देखा जाए तो अमीरों का नशा करना शौक बनता जा रहा है और इसमें खूब खर्च कर अशलीलता का भी नंगा नाच होता है।
नेता के लिए चुनावी चासनी
बठिंडा ही नहीं पूरे पंजाब मे नशा राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक बनकर रह गया है। चुनावी घोषणा पत्र में राजनीतिक पार्टियां नशा खतम करने का वायदा तो करती हैं परन्तु चुनाव के बाद वायदे भूलना व मुकरना अब इन पार्टियों की आदत बन चुकी है। आम आदमी पार्टी ने नशा के मामलों को बहुत ही हाईलाइट किया था लेकिन चुनाव खत्म होते ही पार्टी इस ईशू को भूल चुकी है । चुनाव को छ: माह बीत चुके हैं केजरीवाल की फौज ने एक बार भी नशे पर अपना ब्यान नहीं डाला जबकि उनके कार्यकर्ताओं पर नशा सेवन करने के आरोप लगते आ रहे हैं। देखा जाए तो नशा नेताओं के लिए चुनाव के दौरान चासनी का काम करती है इसी के दम पर ही जीत हार का फैसला मुमकिन है। जिसने अधिक नशा बांटा जीत पक्की अन्यथा डिब्बे खाली ही रह जाते हैं।
हाथी के दांत साबित हुआ नशामुक्त केंद्र
नशामुक्ति केंद्र में नशा से प्रभवित व्यक्तियों की आने की तादाद बहुत ही कम होती है क्योंकि यह केंद्र नशा छुड़ाने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ती हो रही है, ऐसा वहां जानेवाले व्यक्तियों के अनुभव बताते है। सरकारी आकडा़े में ही रोगी को ठीक होते हुए देखते है मगर हकीकत तो कुछ और ही बयां करते है । ज्यादातर नशामुक्त केंद्रो पर मूलभूत सुविधाओं कि कमी है, इस कारण यहां पर भर्ती हुए रोगी को सही तरीके से इलाज नही हो पाता है और वह तंग आकर केंद्र से चला आता है। अब सरकार नशा मुक्ति केंद्रों को खत्म करने की सोच रही है इसकी जगह पर यह केंद्र निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। देखा जाए तो हर शहर में निजी नशा मुक्ति केंद्र खुले हुए हैं जिनका काम सिर्फ नशा रोगी से पैसे ऐंठने तक है। इलाज के नाम पर वह केवल नींद की ही दवा देते हैं, दवाई का असर होने के बाद रोगी को नशे की तलब लगती है और वह केंद्र से बाहर निकलते ही ठेके की ओर दौड़ा चला जाता है।
विजय वर्मा -पंजाब केसरी
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