कोई
भी भाषा ज्ञान हासिल करने का
माध्यम होती है । भाषा अपने
आप में ज्ञान नही होती ,
इस रूप में
विश्व की सारी भाषाएं समान
अधिकार रखती है चाहे वह हिंदी
उर्दू अंगे्रजी चीनी जपानी
जर्मन विश्व की जितनी भाषाएं
लिखी अथवा बोली जाती हैं। तब
किसी एक भाषा को ही ज्ञान मान
लेना किस हद तक उचित माना
जायेगा । लेकिन इस वक्त हमारे
देश में अप्रत्यक्ष रूप में
सही अंग्रेजी को ज्ञान की भाषा
मान लिया गया है जिसे हिन्दुस्तान
के प्रत्येक नागरिक को जानना
आवश्यक शर्त बनने की साजिस
रची जाने लगी है । इसमें सता
प्रतिष्ठान की भी सहमती के
स्वर मिले हुए है । इतिहास
गवाह है कि राजसता के काम काज
कभी भी आम जन कि भाषा में नहीं
होते रहें हैं। पुरानी भाषा
के रूप में संस्कृत को माना
जाता है जिसमें तत्कालीन शासन
के काम काज किये जाते थे । जो
कभी भी आम जन की भाषा नही बन
सकी । यहाॅ तक कि संस्कृत भाष
शुद्र को पढने की मनाही थी ।
संस्कृत पर सिर्फ पंडितो का
एकाधिकार था। वह जो बोल देते
वह अंतिम सत्य माना जाता था
। इस कारण कभी आम जन की भाषा
नही बन सकी । मुगलों के शासन
काल में फारसी को राजकाज की
भाषा के रूप में स्थापित किया
गया था । फारसी पढे बचे तेल
देख भाई किस्मत का खेल ,
फारसी का जानकार
होना ही रोजगार की गारंटी के
रूप में स्थापित था । (तत्कालिक
दौर में अंग्रेजी को वही स्थान
मिला हुआ है )
मुगलकाल
समाप्त होते ही धीरे -धीरे
फारसी का प्रभाव कम होने लगा,
कारण शासन की
भाषा अंग्रेजी हो गयी । अब
अंग्रेजी के जानकार को रोजगार
मिलने लगा जिसे भारत की मुठ्ठी
भर जनता की भाषा बनी लेकिन
सरकारी कामकाज अंग्रेजी में
ही किये जाते रहे ,
अंग्रेज भारत
से चले गये , देश
को आजाद हुए 62 वर्ष
हो गये परंतु भाषा की गुलामी
से हमें अभी तक मुक्ति नही
मील पायी क्योकि शासन कि भाषा
अभी भी अंग्रेजी ही बनी हुई
है । भविष्य में अंग्रेजी का
वर्चस्व और बढने की संभावना
है अगर समय रहते भारतीय भाषा-भाषी
ध्यान नही दिये तो ।
अंग्रेजी
की मार पिछडे दलित आदिवासी
,दूर-दराज
के गाॅव में रहने वाले गरीब,
किसान ,
मजदूर वर्ग
के नई पीढी को भुगतनी पड रही
है यहां के बच्चे सरकारी स्कूलों
में भारतीय भाषा में स्कूली
शिक्षा प्राप्त करके उच्च
शिक्षा डाॅक्टर ,
इंजीनियर की
पढाई अंग्रेजी माध्यम मे
करनी पडती है जिसके कारण भाषा
को लेकर समस्या होती है लेकिन
अभिजात्य वर्ग के बच्चे
अंगे्रजी माध्यम के स्कुलो
में पढते है जिसके वजह से
अंग्रेजी की समस्या नहीं आती
है । अंगे्रजी भाषा के आतंक
के कारण तात्कालिक घटना अखिल
भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान
में एक आदिवासी छात्र ने
आत्महत्या इसलिए कर ली क्योंकि
उसको अंग्रेजी की पुस्तक समझ
में नहीं आती थी । देश के दो
केंद्रीय विश्वविधालय महात्मा
गाँधी अन्तररास्ट्रीय हिंदी
विश्वविधालय वर्धा तथा मौलाना
आजाद नेशनल उर्दू विश्वाविधालय
हैदराबाद यहाँ पर करमश:
र्हिंदी तथा
उर्दू माद्यम से पठान -पठान
एवं शोध कराये जाने का प्रवधान
है , देश
के ज्यादातर केन्द्रीय
विश्वविद्यालय में शोध कार्य
का माध्यम अंग्रेजी को अनिवार्य
कर दिया गया है । 60
के दशक में
जवाहरलाल नेहरू केन्द्रीय
विश्वविद्यालय में कुछ छात्रो
ने अंग्रेजी में शोध करने से
इनकार कर दिया था तथा अपना शोध
हिंदी में जमा किया था लेकिन
इस विश्वविद्यालय में भी अब
शोध अंग्रेजी में लिखने का
दबाव छात्रों को झेलना पड़
रहा है लेकिन कही से कोई विरोध
के स्वर सुनने को नही मिलते
जैसे भाषा कोई गंभीर समस्या
नही रही । मेरा मानना है कि
शिक्षा का माध्यम मातृभाषा
ही होनी चाहिए , वह
व्यक्ति की केंद्रीय उर्जा
है, भाषा
विचारों को जन्म देती है भाषा
मुखौटा नहीं होता । वह मुखौटे
को उतारता भी है इसलिए मातृभाषा
के विकास जरूरी है क्योकि
व्यक्ति सपने मातृभाषा में
ही देखता है । विश्व में जितने
महान लेखक हुए है उन्होंने
अपनी प्रसिद्ध रचनाये अपनी
मातृभाषा में रची है रविद्रनाथ
टैगोर ने गीतांजली की रचना
बांग्ला में की जिसे बाद में
अंग्रेजी में अनुबाद होने पर
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित
किया गया है । महात्मा गांधी
ने भी हिद स्वराज भी गुजराती
भाषा में लिखे थे । मेरा मानना
है कि अगर रवीद्रनाथ टैगोर
तथा गांधी को अंगे्रजी में
लिखनी पडती तो इतनी मौलिक
रचना शायद नहीं कर पाते ।
डाॅ
राममनोहर लोहिया स्वतत्र
भारत के विरले नेताओं में से
एक थे जिन्होने अंगे्रजी का
पुरजोर विरोध किया तथा हिंदी
की वकालत की । लोहिया ने 60
के दशक में
हिंदी माध्यम में विज्ञान
की शिक्षा लेने की योजना बनाई
थी जिसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति
के वैज्ञानिक सत्येन बोस ने
उनका समर्थन किया था अगर आज
शिक्षा का माध्यम हिंदी रहता
तो ऐम्स का आदिवासी छात्र को
आत्महत्या करने पर विवश न
होना पडता । अब तो किसी भी
राजनीति पाटी के ऐजंेडा में
भाषा के प्रति दिचस्पी नही
दिखती है । यहां तक की लोहिया
के विचारों से सहमती रखने वाले
नेता भी चुप्पी साधे हुए है
।
आज
भ्रष्टाचार काले धन देश समाज
के लिए बडी समस्या बन गया है
जिसे लेकर देश में व्यापक
आंदोलन चल रहे है लोहिया
भ्रष्टाचार का कारण विदेशी
भाषा में बढते काम काज को मानते
थे, जो
अंग्रेजी नहीं जानते उनका
गुजारा नहीं हो पाता इसी
अंग्रेजीदा अफसरों की बाते
हिन्दूस्तान की करोडो जनता
समझ नही पाती है और जो दलाल
वगैर होते है उन्हें पैसा
बनाने का मौका मिल जाता है ।
यह सब चलता रहता है ,
कानून वगैरह
सब अंग्रेजी में ही बनते है
, जिससे
जनता को उनका मतलब समझने में
दिक्क्त होती है । अफसर को
अपना काम निकालने में असानी
। कहने का मतलब कि जब तक अंग्रेजी
की बीमारी कायम रहेगी तब तक
ईमानदारी कायम ही नही हो सकती
, एकदम
नामुनकिन है । मेरा मतलब यह
नही कि अंगे्रजी के खत्म होने
से ईमानदारी आ नही जायेगी ।
हाॅं इतना विश्वास है कि जब
अंग्रेजी खत्म हो जायेगी तभी
ईमानदारी कायम हो सकती है ।
लेकिन
आज के कुछ विद्वानों का मानना
है कि विकास अंग्रेजी भाषा
को अपना कर ही किया जा सकता है
क्योकि देश में पिछले दस वर्षो
में विश्व में सबसे ज्यादा
युवा भारत में है अगर वह अंग्रेजी
जानेंगे तो रोजगार के दायरे
बढ जायेगे यह बड़ा ही मासूम
तर्क है । अगर ऐसी बात रहती तो
चीन और जपान को विकास करना ही
नही़ चाहिए लेकिन दोनों देश
खासकर चीन अपनी भाषा मे ही
विकास के नये प्रतिमान की ओर
बढ रहा है और अमेरिकी बाजार
मेें अपनी जगह बहुत तेजी से
बना रहा है जिससे इस देश की
युवाओ को रोजगार की कमी नहीं
होती है। इस तरह के विचार दरअसल
मैकाले शिक्षा पद्धति से
निकले विद्वानों की सोच की
उपज है। और भी इस समय में जब
संयुक्त राष्ट संघ ने फरवरी
2009 मे
आंकडे़ दिये थे । जिसके अनुसार
भारत में 196 भाषाए
लुप्त होने के कगार पर पहुच
गयी है दूसरे स्थान पर अमेरिका
है जहां पर 192 भाषाए
दम तोड़ रही है तीसरे स्थान
पर इंडोनेशिया का नाम आता है
जहाॅ 147 भाषा
नष्ट हो जायेगी । एक भाषा के
वर्चस्व के कारण 199
भाषाए ऐसी है
जिनके बोलने वाले की संख्या
एक दर्जन लोगों से भी कम है ।
कैरम ऐसी भाषा है जिसे उक्रने
मे केवल छह लोग बोलते है । भाषा
विशेषज्ञों का कहना है कि
भाषाए किसी भी संस्कृति का
आइना होती है और एक भाषा की
समाप्ति का मतलब एक पूरी सभयता
और संस्कृति का नष्ट होना।
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