Thursday, 15 March 2012 10:18

जनसत्ता 15 मार्च, 2012: आजाद अंसारी की टिप्पणी ‘बंधक कलमें’ (दुनिया मेरे आगे, 12 मार्च) पढ़ी और इस क्रम में उनकी लिखित पंक्तियों के बीच का अलिखित कथ्य भी अनपढ़ा नहीं रह गया। टिप्पणी से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि दिल्ली के किस सेमिनार में आजाद भाई किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए शामिल हुए थे, लेकिन एक अपरिचित लेखक से हुई संक्षिप्त-सी औपचारिक भेंट के आधार पर उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले हैं वे हास्यास्पद हैं।
आज के साहित्यिक परिदृश्य में ऐसे लेखकों का बड़ा वर्ग रेखांकित किया जा सकता है जो तमाम जोखिम के बावजूद स्वतंत्र लेखन को अपनाते हुए जीवन यापन कर रहा है। अपने इस निर्णय में इन लेखकों ने बहुत से लोभ से खुद को बचाए रखा है जो उन्हें भौतिक संदर्भ में किसी लाभकारी कुर्सी पर बैठा सकते थे। ऐसे लेखकों की लेखकीय क्षमता और उससे ज्यादा, उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता आसानी से समझी जा सकती है। लेकिन आजाद भाई शायद केवल वही देख-समझ पाए जो उनके भीतर पहले से ही जड़ जमाए बैठा हुआ है। यहां एक और महत्त्वपूर्ण बात पर गौर किया जा सकता है। मैकाले की हिंदुस्तानियों के लिए ब्रिटिशकालीन शिक्षा पद्धति ज्ञान से वंचित केवल नकलची बंदर (बैबून) बनाने का साधन थी। उसके बाद बाजार के आधिपत्य ने शिक्षा में ज्ञान का समावेश इस दृष्टि से किया कि शिक्षित व्यक्ति किसी न किसी रोजगार के काबिल बन जाए।
इस तरह ज्ञान को दक्षता में बदलने का काम शुरू हुआ। इस क्रम ने ज्ञान के व्यवहारगत विवेकीकरण को पूरी तरह अनदेखा किया और समाज मानवीयता के सरोकार से रहित काबिल कारीगरों से भरने लगा। यह संवेदना से रिक्त स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इसके निराकरण में, शिक्षा संस्थाओं में, व्यवस्थागत रूप से लेखक की जगह बनाया जाना एक बहुत सार्थक कदम है। इसे बुनियादी शिक्षा के पाठ्यक्रम में कबीर, सूर, तुलसी, रहीम और प्रेमचंद रखने का व्यावहारिक विस्तार कहा जा सकता है।
पहले विद्यार्थी लेखन से परिचित हों,और फिर उनका सामना अपने समय के लेखक से हो। विश्वविद्यालयों में लेखक की हाजिरी के इस विवेकपूर्ण निर्णय को आजाद जी ने किस संकीर्ण दृष्टि से देखा-समझा है, यह साहित्य के संदर्भ में उनके निजी क्षितिज की सीमा बताता है। लगता है, इस सेमिनार में एक लेखक से मिलते हुए उनके अवचेतन का कोई घाव दुख गया है। मेरा सुझाव है कि इस घाव का इलाज भी साहित्य के जरिए वे पा सकते हैं। अभी तो हम यह भी नहीं जानते कि उनके भीतर के पाठक की दिशा और उसका परिमाप क्या है।

’अशोक गुप्ता, इंदिरापुरम, गाजियाबाद