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आजाद अंसारी
जनसत्ता 12 मार्च, 2012: हाल ही में एक सेमिनार में भाग लेने के लिए दिल्ली जाना हुआ। पहला सत्र खत्म होने के बाद हम लोग चाय पर आमंत्रित थे। आयोजक महोदय ने एक व्यक्ति से मेरा परिचय कराया। बातों का सिलसिला आगे बढ़ा। अपना परिचय देते हुए उस व्यक्ति ने बताया कि मैं एक स्वतंत्र लेखक हूं। पत्र-पत्रिकाओं में लेखन से अपने जीवन-यापन की सारी भौतिक जरूरतों को पूरा करता आ रहा हूं। अब मेरी नियुक्ति एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में बतौर लेखक के रूप में होने वाली है। वे जब बोल रहे थे, उस वक्त चेहरे पर खुशी की लकीरें साफ झलक रही थीं, मानो अपने जीवन में समाज के लिए उन्होंने कोई उत्कृष्ट काम किया हो। लेकिन मेरे मन में उधेड़बुन अब भी जारी है कि लेखन प्रक्रिया इतनी सहज हो गई है कि कोई भी खुद को लेखक कह सकता है। लेखक की समाज के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रही।
मेरे मन में यह धारणा बनी थी कि आम आदमी की संवेदना से जुड़ा व्यक्ति ही लेखक हो सकता है। यह प्रक्रिया बहुत ही कष्टकारी होती है। उसकी संवेदना शब्द के रूप धारण कर जनसामान्य तक पहुंचती है, जिसकी संप्रेषणीयता की धार नुकीली होती है। इसमें आम आदमी की भूख और पीड़ा उजागर हो पाती है। इसी कारण शोषक वर्ग अपने इरादों में कामयाब नहीं हो पाता और शोषण के रास्ते छोड़ने को विवश हो सकता है। लेकिन जो व्यक्ति खुद को लेखक होने का दम भर रहा था, उसमें इन शब्दों के प्रति ईमानदारी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी। जब मैं स्नातकोत्तर का विधार्थी था, तब मेरे विश्वविद्यालय में भी कुछ इसी तरह के आवासीय लेखक थे। यानी ऐसे लेखक, जिन्हें लिखने के बदले मोटी पगार मिलती थी। इस कारण उनके लिए लिखना एक सहज प्रकिया नहीं रह गई। वे एक मजबूरी के तहत लिखते थे, किसी बंधुआ मजदूर की मानिंद। वैसे लेखक से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वह समाज के प्रति जवाबदेह होगा। उनमें इतना नैतिक साहस ही नहीं पैदा हो पाता कि वे उस संस्थान की गड़बड़ियों की तरफ अपनी कलम की धार घुमा पाएं, जिनसे उन्हें महीने की तनख्वाह मिलती है।
एक लेखक से समाज यह अपेक्षा करता है कि वह समाज के प्रति जवाबदेह हो और ऐसा रास्ता दिखाए,
जिससे भविष्य में एक बेहतर समाज की रचना का मार्ग प्रशस्त हो। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए किसी लेखक ने ये चंद पक्तियां लिखी होंगी कि ‘धरा बेच देंगे गगन बेच देंगे कली बेच देंगे कुसुम बेच देंगे, कलम के सिपाही अगर सो गए तो वतन के सिपाही वतन बेच देंगे।’ देश की आजादी की लड़ाई के दिनों में सरकार का विरोध करने पर लेखक पर प्रतिबंध लगा दिए जाते थे। उस पर तरह-तरह के जुल्म ढाए जाते। इसी तरह की स्थिति हमें आपातकाल के दौरान देखने को मिली। सरकार से असहमति जताने के चलते लेखक को प्रताड़ित होना पड़ता था। इसके बावजूद उस दौर के लेखकों ने अपनी कलम की धार को कभी कुंद नहीं होने दिया। मगर लेखक जब बाजार के खांचे में खुद को समाहित करने लगा तो धीरे-धीरे यह तेवर खत्म होता चला गया।
आज के लेखन और समाज में खोजने पर भी कोई संबंध बहुत मुश्किल से दिखता है। ऐसा लगने लगा है कि समाज की नब्ज पकड़ने में लेखक चुक गए हैं। वे अपनी कलम को समतल धरातल पर चलाने के आदी हो गए हैं। उनमें इतना नैतिक साहस नहीं बचा कि वे पहाड़ को पहाड़, पानी को पानी और जंगल को जंगल या आदिवासी को आदिवासी लिख सकें। चूंकि लिखना पेशे से ज्यादा मजबूरी होती गई है, इसलिए आज के लेखक पहाड़ को बॉक्साइट लिखता है, पानी को ठंडा पेय, जंगल को वेदांता और आदिवासी को नक्सली लिख देता है। कई बार लगता है कि बहुत सारे लेखकों ने एक भोंपू की तरह काम करना शुरू कर दिया है। जब इसकी व्यक्तिगत जरूरत होती है, तभी बोलता है और वह भी तौल के। बल्कि आज का लेखक कई बार निजी फायदे को ध्यान में रख कर रंग बदलने से भी कोई परहेज नहीं करता।
तब सवाल है कि ऐसे लेखक को लेखक कहना कितना वाजिब है? इसके लिए समाज को अब कोई दूसरा शब्द ईजाद करने की जरूरत है, ताकि लेखक शब्द की गरिमा बची रहे। मेरा मानना है कि वैसे लेखक के लिए उपयुक्त शब्द होगा जनसंपर्क अधिकारी। एक-एक शब्द को बचाने की लड़ाई में समाज को जूझना पड़ रहा है। बाजार के लेखक को बाजार की भाषा में ही संबोधित किया जाना चाहिए, ताकि समाज अपने संबोधनों को सुरक्षित रख सके।

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