अपने शहर से बहुत दूर एक और शहर होता है ,जिसको पेंच भरी गालिया हमारी आँखों ही नहीं .पैरो को भी याद होती है |नक्क्सा कितना भी पुराना हो जाए.,इक कमरा होता है!जो गायब नहीं होता या भूलता नहीं .......| बुढा भी नहीं हिता ! हम सबके अंदर इक कमरा चिरयुवा रहता है | इस कमरे की खिड़कियों में अमलतास दिखता है|अमलतास ,लंबी दूरी के संबंधो का प्रतीक | आँखों से साल भर सिचाता है और सिर्फ जब उसकी आमद होती है तो वासन्ती रंग जाता है | पोर-पोर नाच उठता है ,जैसे पीली पंखुडियां हवा में उडती है कमरे के अंदर तक और फर्श पर कालीन बिछ जाती है ; जैसे मन पर तुम्हारी याद का मौसम आता है ,फाग गाता हुआ ..| सुना है पिछले बरस तुम्हारी शादी हो गए है ...| कोहबर में दूसरा नाम किसका था ?जरा बताना हमे  ! उसके नाम की दुआएं  भी  तो मजार पर बंधनी है |

  जिस दौर में ज्त्निगंधा सात रूपये एसा और एक गुलाब का फूल पाच रूपये में मिलाता था, उस दौर में इस कमरे में हमेशा ये फूल साथ दीखते थे /एक खुशबु के लिए और एक इश्क के लिए .... \ जब तक रजनीगन्धा कि आखरी कली न खिल जाए , गुलाब भी अपनी पंखुरियो में मासूमियत बरकरार रखता था | बारह रूपये में उस कमरे में  रौनक आ जाती थी | इतने दिन हो गए ,वे फूल मुर्घये नहीं है  | जाने कौन -से अमृत भात से पानी आता है | इश्क कि तरह वे फूल भी है.....पुनर्नवा ....| 

किसी त्योहार, शायद दिवाली पर जब ईश्वर  निरिकछन  करने उतरे  थे तो मेरा घर्कुडा उन्हे भुत  पसंद आया था | अल्पना में मैंने कोइ  नाम कहा लिखा था ! उसी वक्त ईश्वर ने कमरे को वरदान दिया - 'पुन : पुनर्नवा भवति ! ' बस , कमरा तभी से ,  पैरों में ,सडको पर ,बदलो में ...कही भी !

सच और वर्चुअल आजकल बहुत -से चौपाल पर मिल रहे है |तो सोच रही हूँ कि कमरों को 'गूगल माप' पर  डाल दूँ कि  खोजने से किसी को भी मिल जाए | इस कमरे में बहुत सी धुप खिलती है | और याद के टेसू लहकते है|कुछ जवाबी पोस्टकार्ड रहते है ,जिन पर भुत -सी गलियों का पता लिखा रहता है |काफी दिनों तक मैंने कमरे पर खत भेजे थे |हमेशा जवाबी पोस्टकार्ड  पर ही |वे खुले ख़त ,मेरे पूरी जीवन जिंदगी कि कहानी हैं |पर मेरे पोस्टकार्ड किसी भी पते पर वापस नही आये कौन उन खली पिली पन्नो पर अपनी  कहानीया लिख के भेजेगा ! उस कमरे कि असली चाभी कई दिनों पहले खो गयी थी |डुप्लीकेट चाबी है मेरे    पास | तुम्हारे पास कोइ छबी है,या बस खिड़की से कमरा देख कर वापस आते हो?
  सभार जनसत्ता - लेखिका पूजा उपाध्याय