जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पाण्डेय जी पिछले दिनों पटना आए थे। संदीप पांडेय जी से इस दौरान कुछ अहम् सवाल :



प्र1-संदीप जी, केंद्र सरकार के द्वारा `ऑपरेशन ग्रीन हंट` अभियान देश के उन राज्यों में चलाया जाने वाला वाला है जो आर्थिक,सामाजिक,और शैक्षिक रूप से पिछड़े तो हैं ही साथ ही माओवादियों का सबसे ज्यादा प्रभाव भी इन्हीं इलाकों में ही है। आप इसे कितना सही मानते हैं ? इस अभियान पर आपका विचार क्या है ?



उ- ये अभियान बिल्कुल गलत है , नृशंस है, मैं इसकी सख्त आलोचना करता हूं। इस अभियान से केंद्र कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं कर सकता सिवाय रक्तपात के। जब तक इन क्षेत्रों का सही विकास कहें तो सम्पूर्ण विकास नहीं हो जाता तब तक चाहे कोई भी सरकार रहे आवाजें उठेंगी ही। माओवादी आज उनकी आवाज हैं।हां, उनके लड़ाई के तरीकों पर प्रश्न किया जा सकता है।



प्र2- आप इस बात से कितना इत्तेफाक रखते हैं कि इन इलाकों में जहां ये ´ऑपरेशन´ चलाए जाने वाले हैं, वहां प्रचुर मात्रा में खनिज है ,जिसकी कीमत अंतरराश्ट्रीय बाजार में करोड़ों-अरबों डॉलर में है और इस ऑपरेशन के द्वारा इन इलाकों के जनआंदोलनों को दबा कर इन इलाकों के खनिजों पर कब्जा करना सरकार का ध्येय है।(जाहिर है ये अंतरराश्ट्रीय बाजार की मंदी को पाटने का तरीका है साथ ही इस अभियान को उन पूंजीपतियों का भी समर्थन है जो इन से लाभ उठाना चाहते हैं) आप कहां तक सहमत हैं?



उ- पूरी तरह से सहमत हूं। रजनेश , आपका प्रश्न बिल्कुल सही है और इसमें कोई दो राय नहीं कि इस ऑपरेशन को पूंजीपतियों का भी पूरा सपोर्ट है। दरअसल `माओवादियों`के खतरे के बहाने बस खनिजों पर कब्जा करना और इन इलाकों के जंगलों पर जबरन कब्जा ही प्रमुख उद्देश्य है और यह पूरी तरह से छिपा हुआ है जिसे बड़े ही व्यापक तरीके से सामने लाने की जरूरत है।



प्र3- इस ऑपरेशन के खिलाफ खड़े बुद्धिजीवियों को कितना खतरा है और आप इन खतरों को कैसे देखते हैं?



उ- रजनेश , विनायक सेन का उदाहरण सामने है। छत्तीसगढ़ में वनवासी चेतना आश्रम को तोड़ दिया जाना, हिमांशु की गिरफ्तारी। मतलब साफ है, हर उस आवाज का दमन करो जो सरकार के दन दमनकारी नीतियों के खिलाफ बोलते हैं, पर इससे आप विरोध को पूरी तरह से नहीं दबा सकते ।



प्र4- इसके खिलाफ आप और देश के तमाम बुद्धिजीवी क्या कुछ कर रहे हैं ?

उ- हमने `citizen initiative for peace` का गठन किया है साथ ही इस मुद्दे को बातचीत से हल करना चाहते हैं और इसके लिए लगातार बैठकों का आयोजन कर रहे हैं।



प्र5- संदीप जी , माओवादियों की लड़ाई को वैचारिकी लडा़ई मानते हैं या यह माओवाद इन क्षेत्रों में विकास नहीं होने की उपज है ?



उ- माओवादियों की लड़ाई वैचारिक है। परंतु , इन क्षत्रों का लंबे समय से पिछड़ापन और विकास का न होना ये सब कुछ इनकी लड़ाई को मजबूत बना रहा है।



प्र6- संदीप जी, इस ऑपरेशन के दौरान तो यह पता लगाना काफी कठिन होगा कि कौन सही में माओवादी हैं और कौन आदिवासी र्षोर्षो



उ- रजनेश , जिन इलाकों में ये ऑपरेशन चलाए जाने कि तैयारी हो रही है वहां अनुसूचित जाति और जनजाति तथा आदिवासीयों का भी निवास है और दोनों मिश्रित हैं , फिर इस खूनी खेल के िशकार तो निर्दोश और ये गरीब लोग होंगे ही। लालगढ़ में भी ये हो चूका है। रजनेश ये दमनकारी है बस यही कहूंगा ।



प्र7- आप माओवादियों के हिंसा के रास्ते से कितना सहमत हैं ?

उ- हिंसा का रास्ता मेरी नजर में एकदम गलत है। मैं इसकी निंदा करता हूं। बातचीत से बेहतर कोई रास्ता नहीं ।



प्र8- इस पूरे प्रकरण के दौरान एक बात जो सामने आई है वो यह कि मुख्यधारा की मीडिया का रूख माओवादियों के प्रति आतंकवादियों जैसा है, खास कर अंग्रेजी टीवी चैनल्स तो `माओइस्ट टेररिस्ट` जैसे शब्दों का जम कर प्रयोग कर रहे हैं। संदीप आपका क्या कहना हैर्षोर्षो



उ- रजनेश , मीडिया का चरित्र खास कर के मुख्यधारा की मीडिया का पूंजीवादी है , उसके अपने हित हैं , सत्ता तंत्र के साथ उसका तालमेल है। फिर यह संभव ही नहीं है कि वो तटस्थ रह सके।



प्र9-क्या वैकल्पिक मीडिया एक रास्ता है?



उ- निश्चत तौर पर किसी भी स्थिति में `alternative media` अपना काम कर रहा होता है। तहलका आदि इसके उदाहरण हैं।



प्र10- संदीप जी , आज देश के अनेकानेक विश्वविधालयों में छात्रसंघ का चुनाव नहीं हो रहा है, या सरकार जबरन ऐसा नहीं होने देना चाहती । इस पर आपका क्या विचार है?



उ- यह लोकतंत्र विरोधी है, गलत है, सरकार को इसे जल्द से जल्द लागू करना चाहिए और तमाम विश्वविधालयो के छात्रों के इस मांग के समर्थन में मैं भी हूं।



प्र11-संदीप , मणिपुर में `AFSPA` कानून के विरोध में `इरोम शर्मीला` के अनश्न के दस वर्ष पूरे हो गए । आपकी प्रतिक्रिया  ?



उ- रजनेश , सरकार जितनी जल्द हो इस दमनकारी कानून को हटाए ताकि मणिपुर के लोग अमन-चैन से जी सकें और इरोम का संघर्ष  एक मिसाल है। देश के उन राश्ट्रवादियों को इरोम के संघर्ष  के बारे में सोचना चाहिए जिन्हें सिर्फ बाहर के खतरे ही नजर आते हैं और देश के अंदर के जन दमनकारी कानूनों पर जिनकी प्रतिक्रिया शुन्य रहती है।



प्र12- लानगढ़ का संघर्ष क्या है ?



उ- लालगढ़ का संघर्ष बंगाल सरकार की विफलता है , जिन्होंने 25-30 वर्षो में इस क्षेत्र को बस अपने कैडरों को शोशण करने की खूली छूट दे कर वहां के लोगों को संघर्ष के लिए उकसाया । लालगढ़ में विकास कुछ हुआ नहीं बस लूट मची थी । हम आदिवासियों के संघर्ष  का समर्थन करते हैं।



प्र13-क्या बंगाल में ममता बनर्जी ही एकमात्र विकल्प है ?



उ- नहीं , वो एकमात्र विकल्प नहीं हैं । पर चूंकि वो अभी वहां के लोगों

की लड़ाई में अग्रणी रहीं हैं इसलिए वो एक विकल्प हैं । रजनेश पर एक बात और , ममता भी अपने चरित्र में पूंजीवादी हैं।



प्र14- वो कैसे ?



उ- कल तक जिस टाटा का सिंगूर की जमीन पर वो विरोध कर रहीं थी , आज उसे वहां ऑटोमोबाइल बनाने के लिए आमंत्रित कर रही हैं।



प्र15- आखिरी सवाल - बताओ, कश्मीर पर क्या सोचना है ?



उ- कश्मीरी जनता को बातचीत के प्रक्रिया में शामिल करना, `AFSPA` को वहां से हटाना, जरूरत पड़े तो कट्टरपंथियों को भी बातचीत में शामिल किया जाए । बस बातचीत ही समाधान है, हिंसा कभी नहीं ।



 संदीप जी , धन्यवाद



 धन्यवाद रजनेश।



रजनेश (स्वतंत्र पत्रकार)


मो-09570834813

ई-मेल-  rajnesh.reporter@gmail.com