बिहार के खगडिया जिले में एक और नरंसंहार हुआ इस बार एक ही जाति के 16 युवको और किशोरों के हाथ पैर बॉध कर गोलियों से भून दिया गया था हाथ पैर बॉध कर जला देने की घटना बिहार मे पहली बार 1977 में पटना जिले के बेलछी गॉव में हुई थी उस समय एक किसान जाति के अपराधियों ने 12दलितों के हाथ-पॉव बॉधकर जिंदा जला डाला था, वह अपने किस्म की तब पहली घटना थी उसके बाद तो बिहार मे नरसंहारों का लंबा दौर चला था ।

भूमि सेना ,लेरिक सेना सनलाईट सेना , लाल सेना , रणवीर सेना , गंगा सेना और न जाने कितने सेनाए वजूद मे आई थी और बन सेनाओं में एक से एक नरसंहारों को अंजाम दिया नरसंहार जाति के आधार पर ही अपरासधियों को इक्ठा किया जाता था , नई शताब्दी के प्रारम्भ कें दो सालों तक इस तरह की कुछ घटनाए घटित हुई और उसके बाद इस की घटनाए बंद हो गई हालांकि अपराध की अन्य घटनाए करने में सबसे बडा नाम रणवीर सेना का था और माओवादी रणवीर सेना की समर्थक जाति के खिलाफ अपनी तरफ से नरसंहार को अंजाम देते थे लेकिन 2002के बाद इस तरह की बडी वारदात विहार में नही हुई । और माना जाने लगा कि अब नरसंहार का दौर खत्म हो चुका है , यहा माना जाने लागा था कि लंबे समय में जाति विभाजित बिहार के लोगों के बीच एक विशेश किस्म का संतुलन स्थापित हो चुका है और इसके कारण जाति विद्वेश के कारण होने वाले नरसंहार अतीत की चीज बन गए है ।

लेकिन खगडिया जिले की ताजा घटना ने उस आशावादीता पर प्रहार कर डाला है इस घटना में एक किसान जाति के 16 लोग मारे गए और वह जाति मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की जाति ही के है मुख्यमंत्री की जाति का सतारूढ जाति कहा जाता है इसलिए यह माना जाता है कि उस जाति के लोगो के खिलाफ पुलिस प्रशासन के लोग ज्यादती नही कर सकते और किसी विवाद में पुलिस प्रशासन की सहानुभूति उस जाति के साथ ही होती है । शायद यह वजह भी नरसंहार का कारण बना है । पहले कहा गया कि माओवादियों ने इस नरसंहार की जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया है ़ उन्होने साफ कर दिया है कि इसमे उनकी कोई भूमिका नही है ़इससे ज्यादा बढकर उन्होने यहॉ तक कह दिया है ि कइस नरसंहार में भाग लेनेवालों का वे इस साल तक सजा दे देेगे । यानी माओवादियों की सहानूभूति मारे गए लोगों के साथ नही यदि माओवादी कोई इस तरह की घटना को अंजाम देते है तो , यानी माओवादियों की सहानुभूति मारे गए लोगों के साथ है अपराधियों के साथ नही यदि माओवादी कोई इस तरह की घटना को अंजाम देते है, तो उसकी जिम्मेदारी लेने में भी पीछे नही हटते है जब वे कह रहे है कि इससे उनका कोई लेना देना नही है तो उनकी बात सच ही होगी ़ मुख्यमं़त्री ने भी सरकारी स्रोत्रों से हुई तफसीस के बाद आखिकार कह दिया है कि यह माओवादी हिंसा नही थी । हिंसा के लिए मुसहर जाति के दलितों को भी शुरू शुरू में जिम्मेदार बताया गया ़ मुसहर जाति के लोग बिहार में सबसे गरीब लोगों मे है इस घटना को वे अपने बूते अंजाम देने की स्थिति में है ही नही ़ इस तरह के लोगों के बीच माओवादियों की पहुच होती है लेकिन जब माओवादी इस घटना में शामिल नही है ,तो फिर इस घटना को दलितो के सिर पर थोपना भी गलत होगा , हांलांकि उस समुदाय के अपराधी प्रवृति के कुछ लोगों के इसमें शामिल होने से इनकार नही किया जा सकता ।

खगडिया बिहार का वह इलाका है ,जहॉ रकड घास होती है , इस समय घास के कारण ही इसका नाम खगडिया पडा है , कहते है कि यह इलाका इतना दुरूह है कि जमीन की पैमाइश करने का विचार ही त्याग दिया ,यह इलाका दुर्गम है इसलिए महाबली अकबर के लोग भी जमीन की पैमाइश नही कर पाये थे ़ यह नरसंहार भी जमीन की लडाई को लकर ही किया गया है । इस इलाके की जमीन पर बडे-बडे जमीदारों का मालिकाना हक था ़ ज्यादातर जमीदार इस इलाकेके बाहर के ही थे , जमीन पर से ढीली होने लगी वे अपनें कब्जे में उन्होने रख पाने में नाकाम होने लगे कम्युनिश्ट आंदोलनों के तहत मजदूर तबके के लोगो ने उन जमीनों पर कब्जा प्रारभ रख पाने में नाकाम होने लगे कम्युनिश्ट आंदोलनों के तहत मजदूर तबके के लोगों ने उन जमीनों पर कब्जा प्रारभ कर दिया जमीदार ने जमीन के कुछ टुकडों को स्थनीय किसानों को बेच दिया कब्जा मजदूरों का था ़इस तरह जमीन पर खेती कौन करेगा इसका झगडा तेज हो गया इस नरसंहार की जड में यही जमीन विवाद है़ बिहार में भूमि सुधार को अंजाम नही दिया जा सका है सरकारी जमीन का मामला अगल हैं़़ सर्वाेदय आंदोलन में दान मे मिली जमीन को भी भूमीहानों के बीच नही बॉटा जा सका है , कौन सी जमीन सरकारी है , कौन -सी जमीन सर्वाेदय में दान में मिली है और कौन -सी जमीन निजी ,मल्कियत की है , भूमि विवाद को कानूनी तरीके से तेजी से निबटाने में प्रशासन का तंत्र पूरी तरह से अक्षम है ।सच तो यह है कि सरकारी अमलों को हल करने लग जाते है , ताकत अपनी जाति के लोगों के बल पर भी अर्जित की जाती है ़ इस तरह जमीन का यह विवाद जाति का भी विवाद बन जाता है जमीन के लिए हुआ यह नरसंहार जाति नरसंहार के रूप् में सामने आ जाता है । खगडिया मे यही सामने आया है ।
इस घटना में कौन - सी शक्तियॉ शामिल है इसका खुलासा अभी नही हो पाया है , जिनके बीच में जमीन को लेकर विवाद चल रहा था , वे ही इसमें शामिल है अथवा अन्य लोग लेकर विवाद चल रहा था , वे ही इसमें शामिल है अथवा अन्य लोग भी शामिल है इसके बारे में भी प्रशासन मौन है ,माओवादियों के तेवर भी यही लगता है कि नरसंहार को अंजाम देने में मजदूरों का नही बल्कि भूमिपतियों का ही मुख्य हाथ हो सकता है जमीन से जुडे तीन तत्व वहॉ कर रहे है जमीदार किसान और मजदूर किसानों और मजदूरों के बीच के संघशZ का फायदा उठाकर जमीदार भी इस छोड में मुख्य भूमिका निभाने वाले साबित हो सकते है इस नरसंहार के बाद सरकार को अन्य स्थानों पर चल रहे भूमि विवाद को सलटाने के लिए सक्रिय हो जाना चाहिए अन्यथा फिर से नरसंहार की पुराना दौर प्रारभ हो सकता है । सभार लोकमत समाचार
उपेन्द्र कुमार