

निशचित रूप से ये खबर चौकाने वाली है , एक अनजान से हिन्दी पाक्षिक अखबार `खबर लहरिया ` को युनेसको के प्रतििश्ठत पुरस्कार किंग सेजॉग साक्षरता सम्मान 2009 से नवाज गया , दरअसल,यह अखबार हिन्दी में भी खडी बोली में नही, बल्कि बुंदेलखंडी में हैं, उतर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के चित्रकूट बांदा जिलों के लगभग चार सौ गॉवों में यह अखबार पढा जाता है , इसमे राजनीति , देश-विदेश ,करेट अफेयर्स के साथ ही जोर होता है, ग्रामीण और सुदूर अंचलों की खबरों पर , सबसे ज्याद दिलचस्प तो यह है कि इसे दलित ,आदिवासी और मुस्लिम महिलाएं चलाती है और खबरों को देखने -समझने का नजरिया भी ‘ाहरी - व्यावसायिक अखबारों से अलग है,
` खबर लहरिय ` ने तो बडे ‘ाहरों से प्रकाशित होने वाला कोई प्रतििश्ठत ,लकदक अखबार है और न ही इसमें भारी -भरकम नाम वाले प्रतििश्ठत लेखकों -पत्रकारों के कॉलम , यह मुख्यत: महिलाओं से संबंधित सवालों पर केंद्रित अखबार है , जिसमें भ्रश्टाचार ,अन्याय ,शोशण को प्राय: मुद्दा बनाया जाता है , मुख्यत : गॉवों में प्रसारित यह अखबार है ,जिसमें 25 हजार लोगों में पढा जाता है और वो भी मुख्यत: निचले तबके की नव-शिक्षिताओं के बीच ,ऐसे में सवाल उठना स्वाभविक है कि आखिर `खबर लहरिया` में ऐसा क्या है , जो उसे इतने बडे अंतर्राश्ट्रीय सम्मान का हकदार बनाता हैª‐‐‐‐ ? ऐसा भी तो नही है कि गॉवों और महिलाओं में मुद्दों पर केंद्रित सिर्फ यही एक अखबार हो‐‐‐‐ ?
छरअसल ,सवालों की श्रंृखलाएं तो काफी बडी हो सकती है , लेकिन ध्यान से देखे तो बुंदेलखंड के क्षेत्र भारी अभाव , समस्याओं ,पिछडेपन और गरीबी से ग्रसित रहे है , हाल में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने इस क्षेत्र के विकास के लिए आठ हजार करोड के पैकेज की मॉग केंद्र से की है, तो मुख्यमंत्री मायावती भी क्षेत्रिय विकास की बात उठाती रही हैं , यह क्षेत्र सामंती मिजाज और डाकुओं के आतंक से भी जूझता रहा है, ऐसे में जहॉ रोटी -पानी और रोजगार के लाले हों , वहॉ के गॉवों की कमजोर तबकों की महिलाओं को एकजुट करके अखबार निकालने की कल्पना ही किसी को भी झकझोरने के लिए काफी है ,
दिलचस्प तो यह है कि दलित,मुस्लिम और आदिवासी महिलाएं न केवल खुद खबरों का संकलन करती है,बल्कि पूरे अखबार को बिकने योग्य बनाना और दो रूपऐ में बेचना नििश्चत रूप से अपने ढंग का देश में नायाब प्रयास है, अखबार की प्रकाशक शालिनी जोशी न केवल पुरस्कार को लेकर खासी उत्साहित है, बल्कि बताती हैं कि सामाजिक सवालों ,महिलाओं के लोकतंत्रीकरण और उसमें भी ग्रामीण महिलाओं कें मुद्दों पर हमारी ताकत भी है‐‐‐‐‐ ?
गौरतलब ये है कि बाजारवाद ,व्यावसायिकता और गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में यह खबर अपने आप में गर्मी से तपते रेगिस्तान में शीतल जल के सोतो के समान है, जब मूल्यों ,संस्कारों,विचारों का पत्रकारिता जगत में भी व्यापक क्षरण चिंता का विशय हो, ऐसे में लोंकतांत्रिक संस्कारों से जुड कर पत्रकारिता की हर पहल खुद ब खुद स्तुत्य है, समझा जाना चाहिए कि पहल कोई भी हो, कितनी ही छोटी क्यों न हो, यदि वो सारगभिZत है और जनसराकारों से सम्बद्व
है , तो उसे निर्णायक मुहिम भी बनता ही होता है, गांधी ने भी अपनी पत्रकारिता की लौ किसी साबरमती या वर्धा के आश्रमों से ही चलाई थी , ये संभव है और स्वाभाविक भी कि देश के बडे अखबारों को है, लेकिन ये छोटी पहल खुद में प्रशंसनीय है,
इसे पत्रकारिता में एक नई पहल म्ौं इसलिए भी मान रहा हंू,क्योंकि अभी बांद्रा,चित्रकूट और कबीZ के जिन अभावग्रस्त और नितांत पिछडे क्षेत्रों और डकैतों के आतंक के बीच गॉव और उसके सरोकार को ये अखबार मुद्दा बना रहा है - वो यात्रा थमती प्रतीत नही होती, कमजोर तबके की महिलाओं की जिजीविशा और इच्छाशक्ति को सामंती समाज और बाजार की क्रूर प्रतिद्वंद्विता यदि पराजित नही कर पाती ,तो साफ लगाता है कि हमारे सुदूर और अविकसित अंचलों और गॉवों की पगडंडियों की आस और अविकसित अंचलों और गॉवों की पगडंडीयों की आस और भारतीयता के मूल्य अभी मुरझाए नही है , इसे सुखद आश्चर्य के साथ नई कोपलों का फूटना ही तो कहेगे , जब खबर लहरिया की पत्रकार कविता को ये कहते सुना कि अब हम मध्य बिहार के नक्सल प्रभावित अविकसित क्षेत्रों जैसे गया, सीतामढी और दूसरे इलाकों से भी अखबार निकालेगे , और हमारे मुद्दे होंगे जनता के सवाल ,महिलाओं की आवाज कविता अब बांदा संस्करण की संपादक , उनका कहना है कि वैसे तो हमारी यात्रा से जारी है लेकिन ‘ाुरू मे पुरूश प्रधान समाज से प्रभावित इन ग्रामीण क्षेत्रों की पत्रकारिता में हमारें लिए बडी गहरी मुिश्कलें थी , सवर्ण सामंती मानसिकता की चुनौतियों में हम महिलाओं ने खुद को साबित किया , आज हालत ये है कि दूर -दाराज क्षेत्रों की खबरों को लेकर बडे राश्ट्रीय अखबार भी सिर्फ हम पर ही भरोसा करते हे , वजह ये कि उनके पत्रकार उन इलाको में प्राय: जाने की कल्पना ही नही कर सकतें , जहॉ तक हम पहुंचते है ,वे हमारी खबरों को ही प्रकाशित करते है ,और ये कवायद उनकी मजबूरी भी है ।
दरअसल कविता की पत्रकारीय सोच लोकतांत्रिक कैनवास की व्यापकता का ही अहसास कराती है ,पत्रकारिता हो ,राजनीति हो या समाज का कोई अन्य क्षेत्र ,सभी की दरकार एक है - जनसरोकार ,राजनीति क्षेत्रीय और आंचलिक स्तर पर छोटी-छोटी पार्टियों या फिर जन समूहों का विभि़न्न सामाजिक स्तरों पर नई आवाज बनना - ऐसी ही आकांक्षाओं की समवेत अभिव्यक्ति ही तोे है , गौर करने की बात ये है कि जागरूक और शिक्षा के विस्तार के साथ ही इन लोकतांत्रिका प्रवृतियों को भी पंख मिले है , उनका विस्तार हुआ है ,उन्हे सामाजिक -राजनीतिक स्वीकार्यता मिली है , इसमें कोई दो राय नही कि हमारे लोकतांत्रिक ताने -बाने की मजबूती और बेहतरी के लिए ऐसा होना जरूरी भी है , खबर लहरिया का सम्मान दरअसल किसी एक अखबार या चंद महिलाओं के प्रयास का ही पुरस्कार नही हैे - यह सम्मान है भारतीय लोकतांत्रिक मनीशा के विस्तृत -व्यापक होते फलक का और इस अहसास का कि पत्रकारिता में लाख धुंधल के बावजूद जनसरोकार ,मुल्य ,विचार जिंदा और मजबूत है, कमजोर नही , अंत में खबर लहरिया के जिजीविशा और चुनौतियों से संघर्ष की इच्छाशक्ति को सलाम !और सलाम उनकी जुबान बनने के लिए जो अब तक या तो बेजुबान थे या फिर अपनी ही ताकत से अनजान
गरीश मिश्र
साभार लोकमत समाचार नागपुर 07-08-09