
धमाल अमीर खुसरों के शब्द को कहां से कहां तक पहुचा दिया । धमाल का मतलब होता है ओ भिंगा मस्ती का दिन ,अमेकिन जो अपने
पोडक्ट को बेचने में लहजा अखयार करते है । उसमें अगर हम हिन्दुस्तानी प्रयोग करते है तो खराब लगता है । मुझे कोई एतराज नही अमेरिकन एवं अमेरिका के अंदाज में
अपने पोडक्ट को बेचना , लेकिन जब हम गुलामाना जेहनियत के तहत वही लहजा अखतयार करते है तो फिर अफसोस की बात है कि हमारी जेहनियत अभी तक गयी नही है ं आजाद हो गये मगर दिमांगी तौर पर आजाद नही हुए । अभी तक हालीवुड नाम ऐसी संस्था का है । जिसमे ंबडी -बडी फिल्में बनाई है । महान फिल्में बनाई है । हमारें याहॉं भी न्यू थीयेटर प्रभात टाकेज ने अच्छी फिल्में बनाई हमारे यहां भी बडे-बडे कलाकार पैदा हुए है । शांताराम ,पीसी बरूआ एस डी बर्मन ,जिस
जिस तरह हिचकॉक लेंसेज बनाने के लिए मशहूर था ं । सस्पेंस के लिए ,शांतराम भी टेक्नोलॉजी में दखल रखते थे । वे भी लेंस के साथ खेलते थें । एक फुल पर्दे पे,ऑख अमृत मंथन में एक धर्मांतमा नाम का सख्स हाथ में खंजर लिए दैडता है । यह कमाल 1930 का है
जब बुरा जबाना होता है अच्छे के पहचान कैसे करेगे जब तक बुरी चीज मैजूद न हो ,उसकी प्रतिक्रिया मैजूद न हो तो,उसके टक्कर में एक चिंगारी निकलती है । एक क्रिएटीव आदमी की । अगर आप सर्फ मीठा-मीठा ही खाये तो आप उब जायेगे तमीज करना भूल जायेगे कि क्या अच्छा है क्या बुरा है । यह आप को तय करना है कि कौन सी चीज अच्छी लग रही है कौन सी ब्रेन वासिंग कर रही है । कौन सी चीज आपको बेच्ौन कर रही है । कौन सी चीज उकसा रही है । नीद आने नही दे रही है ।
मनोरंजन के कई लेबल होते है । आपने कभी बलराज साहनी कि फिल्में देखे होगें आज जो फिल्में बाक्स आफिस पर हिट हो गई उस फिल्मों को ही अच्छा मानते है । लेकिन जो आप देखकर भूल जाय वह फिल्म आर्ट के उद्ेश्यों को पूरा नही कर रही है । जो फिल्म आप को सताए प्रश्न के साथ पीछा करे । वही फिल्म कलात्मक है ।
। लेकिन हम समझते है कि फिल्म जवाब पेश करे । वह फिल्म कलात्मक है । जवाब के लिए तो लोग मैजूद है ं
आदिवासी कितना कल्चार लिए हुए है, अगर आप सही मानें में उनका व्यिक्त्व विकसित करना चाहते है तो जिसमें उनका खुदमुखतररी महसूस होगी कि हम चला रहे हे अपना शासन खुद तो फिर जानवर भी बच जायेगे पेड -पौधे भी बच जायेगे लेकिन आपको कष्ट होगा । उन्हे अपने जैसा बनाये टेबल कुसीZ पर बैठ कर खाये डीग्रीया हासिल करे अपनी भाषा के प्रति घृणा पैदा करे ं तो फिर वह विकास है । उनको जंगलों से निकालकर चपरासी ,मील मजदूर बना देना । असम में हजारों मजदूर चाय के बगानों में काम करते है । उनकी जबान छतीसगढी है । लकिन लहजा बदल गया है । वह एम नवीन भाषा बन गयी है ं
इसरो में पहली बार गुब्बारे का प्रयोग हुआ था तो लगा कि आर्ट वाले जैसे सोचते है वैसे ही साईस वाले भी सोचते है
हबीब तनवीर का महात्मा गाँधी हिन्दी यूनिवर्सिटी में दिए बयाखन का अंश
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