मंगलवार, 28 अप्रैल 2009( 10थ59 `झ् )


- अविनाश दत्त (बीबीसी हिंदी संवाददाता)

अपने ऊँची छत वाले छोटे से कमरे में बैठे, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में शिक्षक डॉक्टर अब्दुल वहीद इस बात से परेशान हैं कि जब भी मुसलमानों से संबंधित कोई किताब या टीवी और अख़बारों में कोई खबर आती है तो उसमे अजान की आवाज का, चाँद-सितारे का या मस्जिद की मीनारों का ही प्रयोग होता है।
वह कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि ये मुसलमानों के धार्मिक चिह्न हैं। हर समुदाय के होते हैं। पर क्यों मुसलमानों के बारे में बात अमीर खुसरो की पहेलियों से, नजीर अहमद अकबराबादी के दोहों से, बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई से भी शुरू नहीं की जा सकती। किसी ऐसी चीज से भी शुरू कर दो जो मुसलमानों की परेशानियों को दिखाता हो।

इस तरह चुनाव के समय जब भी \'मुसलमानों से जुड़ी राजनीति\' के बारे में बात होती है तो सारी बहस आकर सिमट जाती है लंबे समय से चले आ रहे प्रतीकों पर।

तमाम बदलती चीजों से अलग, मुसलमान राजनीति का चेहरा उतनी तेज़ी से बदलता नहीं लगता जिस तेज़ी से बाकी मुद्दे समय के साथ बदल रहे हैं। मुसलमानों के लिए बेहतर मानी जानी वाली पार्टियाँ विरोधियों पर बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों के साथ होने का आरोप लगाने लगती हैं।

मुसलमान नेताओं और मुसलमानों के नेताओं में होड़ लग जाती है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ, बाबरी मस्जिद, अलीगढ़ के अल्पसंख्यक दर्जे और उर्दू भाषा की तरक्की पर वादों में एक दूसरे को पछाड़ दें।

सोची समझी रणनीति? थ डॉक्टर अब्दुल वहीद कहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष दल मुसलमानों के वोट तो चाहते हैं लेकिन हकीकत में वो अपनी नीतियों से मुसलमानों का भला नहीं करना चाहते।

उनके अनुसार राजनीतिक दल और मुसलमान नेता मिलकर ऐसे मुद्दे चुनाव में उठाते हैं, जो साठ, सत्तर या अस्सी के दशक तक मुसलमानों के लिए सबसे बड़े थे। असली मुद्दे जैसे-मुसलमानों की बस्तियों में विद्यालयों की संख्या में कितना इजाफा किया गया, ये मुद्दे गायब हो जाते हैं। डॉक्टर वहीद उत्त प्रदेश के रामपुर का उदाहरण देते हैं। रामपुर में मुसलमान मतदाताओं की संख्या सबसे ज़्यादा है।

साथ ही तीन बड़े मुसलमान नेता वहाँ से आते हैं। तब भी वहाँ साक्षरता महज 33 प्रतिशत है। डॉक्टर वहीद इस पर कहते हैं कि आजम खान से पूछे कोई कि ऐसा क्यों है? मैं उसी इलाके का रहने वाला हूँ और मैं बाबरी मस्जिद बनवा देने या पर्सनल लॉ बचा लेने जैसे उनके नारों के चक्कर में नहीं आता।

समाजवादी पार्टी के महासचिव पूर्व राज्यसभा सदस्य आजम खानरामपुर शहर से सात बार से विधायक का चुनाव जीत रहे हैं। कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव बेगम नूरबानो और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी, अपने-अपने दलों से समाजवादी पार्टी की वर्तमान सांसद जया प्रदा के खिलाफ भाग्य आजमा रहे हैं।

पहचान मिटाने का षड्यंत्र थ मैंने आजम खानसे पूछा कि क्यों मुसलमान नेताओं का सारा ज़ोर चार भावनात्मक मुद्दों पर ही है? आजम खान बोले, आप ये बातें कहकर मुसलमान को इतना शर्मिंदा कर देते हैं कि वो कुछ कह ही न पाए। सोमनाथ का मंदिर सैकड़ों साल पहले लुटा और मूर्ति तोड़ दी गई- ये बात हिन्दू आज तक नहीं भूला पर मुसलमान ये भूल जाए की बाबरी मस्जिद मस्जिद थी।
उनका कहना था कि मुसलमान वो उर्दू भाषा भूल जाए जिसमें उसका इतिहास लिखा है और ये पढ़े की बाबरी मस्जिद में राम पैदा हुए थे। इसी तरह से वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए न लड़े और कहीं उसे दाखिला न मिले।

पर आजम खान के घर से महज चंद किलोमीटर दूर सिविल लाइन्स चौराहे पर आम मुसलमान आजम खानकी बातों को सिरे से खारिज करते हैं। चाहे मेरठ हो, देवबंद हो या अलीगढ़।हर जगह हर तबके के लोग लगातार शिक्षा को मुसलमानों का सबसे बड़ा मुद्दा बताते हैं।

आम मुसलमानों में भावनात्मक मुद्दों को लेकर रुचि है पर उसके एजेंडे में आश्चर्यजनक रूप से उच्च शिक्षा में आरक्षण की माँग सबसे ऊपर है। यहाँ तक कि मजहबी शिक्षा के बड़े केंद्र दारुल उलूम देवबंद के छात्र भी उच्च शिक्षा में आरक्षण चाहते हैं।

अजीब लगता है जब एएमयू के छात्र कहते हैं कि विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा इनके लिए कोई मुद्दा नहीं। अलीगढ़ के एक छात्र ने मुझे कहा कि हमारे लिए मसला है लगातार 120 वर्षों से चला आ रहा खाने का मेन्यू, हॉस्टल, सुविधाएँ। पर जब भी हम ये बातें उठाते हैं हमें कहा जाता है ऊपर उठो अभी पर्सनल लॉ और एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे के लिए सोचो। अलीगढ़ के छात्रों से बात करते हुए लगता है कि अयोध्या, पर्सनल लॉ कोई मुद्दा ही नहीं हैं।शिक्षा की बात हर तरफ है।

फिर भावनात्मक मुद्दे कैसे? थ आजम खान हों, मेरठ के हाजी अखलाक हों, मुलायमसिंह यादव हों या लालू प्रसाद यादव हों। सभी मुसलमानों से जुड़े भावनात्मक मुद्दे उठाते जा रहे हैं और उनको मुसलमानों का समर्थन भी मिल रहा है। इस सवाल पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर डॉक्टर असगर बेग थोड़ा झल्ला जाते हैं।

उनके अनुसार मुसलमानों का अपना कोई नेता नहीं है तो ये लोग हमारे मुद्दे भी हमें बताते हैं। हमने कब कहा कि बाबरी, उर्दू या पर्सनल लॉ हमारे मुद्दे हैं। बात करिए तो साफ महसूस होता है की आम मुसलमान अपने मौजूदा नेतृत्व से नाउम्मीद हो चुके हैं। पर उनके पास कोई रास्ता नहीं है। पार्टियाँ अपने लिए खास तरह के मुसलमान चुनती हैं और उन्हें टिकट देती हैं।

मुसलमान बेचारा क्या करे वोट तो डालना ही है। उसे किसी ऐसे से बचना भी है जो जान लेने पर आमादा हो। तो मरता क्या न करता वोट डाल देता है उनमें से किसी एक को जो सामने हैं- चाहे वो उनसे बिलकुल ही खुश न हो।

नया रास्ता थ राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव कहते हैं की तमाम चिढ़ और ग़ुस्से के चलते सतह के नीचे कहीं कुछ बदल रहा है। मुसलमान अपने दलों को लाने के छोटे-बड़े प्रयास कर रहे हैं। चाहे वो असम में एयूडीएफ़ हो या केरल में पीडीपी- कोशिशें जारी हैं।

योगेंद्र जो दूसरा बड़ा बदलाव देखते हैं वो है कि राजनीति में पिछड़े और दलित मुसलमान उसी तरह से मुस्लिम राजनीति का चेहरा बदलने की कोशिश कर रहे हैं जिस तरह से मंडल ने उत्तर भारत की राजनीति के साथ किया। वैसे अलग राजनीतिक मंच के लिए माँग बहुत ज़्यादा है पर लोग तय नहीं कर पा रहे की उसका स्वरुप क्या हो।

देवबंद के छात्र चाहते हैं की मुसलमान धर्मगुरु आगे आएँ तो अलीगढ़ के छात्र कहते हैं कि मुसलमानों के अलग दल लोग दूसरी मुस्लिम लीग की तरह देख सकते हैं।पर विचार जारी है और रास्ता शायद शायर नवाज देवबंदी के बोलों में कहीं है -

दरहम बरहम दोनों सोचें,
मिलजुल कर हम दोनों सोचें
दर्द का मरहम दोनों सोचें
सोचें पर हम दोनों सोचें
घर जल कर राख हो जाएगा
जब सब कुछ खाक हो जाएगा
तब सोचेंगे!
सोचो आख़िर कब सोचेंगे
सोचो आखिर कब सोचेंगे