कविता
सच सच के तरह था
झूठ था झूठ था झूठ की तरह
फिर भी मिलते जुलते थे दोनों के चेहरे
समझौता था परस्पर थी गहरी समझदारी
राह दोनों निकाला करते थे मिलकर
सच के भी अपनी दुकानदारिया थी
,मुनाफे थे झूठ के भी अपने

2
ऊट किसी भी करवट नही है बैठने वाला
ऊट शताब्दीयों से यही करते आया है
ऊट जानता है कि वक्त कैसे वर्वाद किया जाता है लोगो का

3

विश्वास एक ऐसी खुटी है
जिस पर टंगें है सभी के कपडें़
उसके भी जो विश्वासघाती है



लड़की

चल नदी सी चलती
चल लहरों सी मचलती चल
सोख़ सूर्ख सुबहों में
ीरे -धीरे ढलती चल
तप रहा है जब सूरज
वर्फ सी पिघलती चल
जंगलों के सीने से
राह सी निकलती चल
मोड -मोड पहरे है
रास्ते बदलती चल
ठोकरों से ढर कैसा
बस की बस समहलती चल
तु कलम की बेटी है
गोलिया निगलती चल
दूर तक है ख़ामोशी
याद सी टहलती चल


दूर -दूर तक कोई नही है
फिर किस की अगुआई में जल रहा है लैपोस्ट
वशोZ बाद हम बैठे हे इतने करीब
वशोZ बाद टूटी आत्मा से वही जानी पहचानी सुबह
वशोZ बाद हम हुए धरती हवा पानी और आकाश

गज़ल
1
करीब मेरे मगर खुद के आस पास हो तुम
लहकती बुझती हुई आग की उजास हो तुम
चहकते गाते परिदे की तुम खामोशी हो
तुम खिली सुबह कि तरह शाम की उदास हो तुम
हजार चुपके से गिरी हलचलों के घेरे में
रूकी -रूकी हिचकती से कोई सास हो तुम
बने नही कि टूट जाये एक बूत जैसे
इतनी आम इतनी आम इतनी ख़ास हो तुम

2

पहल हवा के गज़ब ढंग से हुई होगी
धुआ उठा है कही आग भी लगी होगी
इंक़लाब जंगल का बात राज कि है
ये पतियों ने फुलों से किस तरह से की होगी
जड़ तने चुप्पी साख हिल गयी होगी
टहनीयों कि सह पाकर पहली लौ उठी होगी
जंगलों के कानों तक किस तरह गई आखिर
ये ख़बर फजाओं को बुलबुलों ने दी होगी
अब शहर जो आयेगी जो भी जैसी भी
इतमिनान कि होगी इंतहान की होगी



होठ में कोई किरण सुबह की
ऑंख में सपने चॉंद के है
आप भी आप की राते थी
दिन भी आप के याद के है



धुप में तपती रेत से होकर सूरज ने महसूस किया
राह में जो नक्से कदम है सक्त सफर के बाद के है
अपनी तो सारी राम कहानी दो जुमलों मे खत्म हुई
खुिशया आपके चाहत की है
दर्द दिले बवार्द के है
धरती पे आकाश टीका है
ये अचरज की बात नही
हर गुम्बद के ऑख में हसते कुछ सपने बुनियाद के है
रूप मती के राग नगर को शायद यह मालूम न
था कल भी फैज़ाबाद के थै आज भी फैज़ाबाद के है

विजय बहादुर सिंह
लेखक वार्गथ पत्रिका के संपादक है