हवा चली तो
पतझरों ने धरतीयों को चूम कर कहा
बहार आयेगी
खिजा है चंद रोज कि बहार लौट आयेंगी

बहार ओ
जिसके धुन में मजनूओं ने सरहदों को छू लिया

बहार ओ
जो रहबरो ने पाकर खो दिया

बहार ओ
जो जिसके रहजनों के हाथ बेच कर खिजा खरीद लाये थे
ये रहजनों की
रहजनी तो संगे नीले राख है

जो जिंदगी कि मोहनी से अब भी तुझ को चाह है
मैं जिंदगी के ‘शान में फिर कशिदे गाऊगा
मैं फिर लौ लगाउगा ,
मै फिर से दीप जलाउगा
करूगा फिर से तेज तर कलम के नस्तरो की धुन में
मेहनतो कि देवता से फिर कहुगा या खुदा

समेट ले वजूद को
बजूद को समेट के

तु अपनी चुपी को तोड दे
फिर एक बार लब्जे कुन्ब से

फिर हो नया जहा अता
वही समर हो फिर अता

मैं जिसको चख के कह सकू मुझे जहांन चाहिए
ये स्वर्ग -नरक साथ है सराद ही सराद
चंद है इधर उधर तो लाखों लाख है

मुझे तो अपनी धरतीयों पर बहार चाहिए
मुझे तो अपनी धरतीयों पर बहार चाहिए