
सत्रह साल की लड़की के स्पवन में
आसमान नही है
पेड पहाड और तपती दोपहर नही
सुबह की एक ऑच भी नही
घर में फुदकती चिडिया -सी लडकी
सपना देखती है बस
अठारह की होने और घर बसाने का ।
लड़की ने तलाशा सुख
हमेशा औरो में
खुद में कभी कुछ तलाश ही नही
सिखाया गया उसे हर वक्त यही
लड़की का सुख चारदीवारी के भीतर है
सोचती है लडकी
सिर्फ एक घर के बारे में ।
लड़की जो घर की उजास है
हो जायेगी एक दिन खामोश नदी
खामोशी से करेगी सारे कामकाज
चाल में उसके नही होगी नृत्य की थिरकन
पॉव भारी होंगे पर िथ्रकेंगं कभी नही
युगों -युगों तक रखेगी पॉव धीरे-धीरे
धरती पर चलते धरती के बारे में कभी नही
सोचेगी लडकी ।
कभी नही चाहा लोगों ने
लड़की भी बैठे पेड पर
खुद लडकी ने नही चाहा कभी
चिडियों की तरह उड जाना
नही चाहा छू लेना आकाश ।
कभी नही देख पायेगी लड़की
आसमान से निकलते नदी
नदी से निकलते पहाड
पहाडों के उपर उडती चिडिया
नही आ पायेंगी कभी
लड़की की ऑखों में ।
ओ मेरी बहन की तरह
सत्रह साल की लड़की
दौडते हुए क्यों नही निकल जाती मैदानों में
क्यों नही छेडती कोई
तान तुम्हारे सपनों में क्यों नही है
कोई उछाल !
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