ये तस्‍वीर हिंदी के कथाकार, विचारक और कभी सेरा यात्री के साथ वर्तमान साहित्‍य के यशस्‍वी संपादक रहे विभूति नारायण राय की है। हिंदी की दुनिया इनसे मोहब्‍बत करती रही है - क्‍योंकि इन्‍होंने हमेशा हाशिये की बेजुबान आबादी को अपनी आवाज़ दी। दंगों के दौरान पुलिस की सांप्रदायिक भूमिका को जिस तरह से उन्‍होंने मयसबूत एक किताब में पेश किया - उससे साफ हुआ कि विभूति नारायण किस कदर इंसाफ़पसंद आदमी हैं। महाश्‍वेता देवी ने भी उनके बारे में अच्‍छा-अच्‍छा लिखा है। वही थे, जिन्‍होंने अयोध्‍या में विश्‍व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल को डंडे लगवाये। लेकिन महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में जिस तरह के कारनामे वो लगातार कर रहे हैं, उससे जाहिर होता है कि विभूति भी उन लोगों से अलग नहीं हैं, जो सत्ता और ताक़त मिलते ही अपनों को जलेबियां बांटने में जुट जाते हैं और प्रतिभा कहीं किसी कोने में दुखियारी की तरह पड़ी रह जाती है। एक संवाददाता ने हमें इस शर्त पर छापने को ये रपट भेजी है कि हम उनका नाम उजागर नहीं करेंगे।


यूपी के पुलिस महानिदेशक पद से इस्‍तीफा देकर विभूति नारायण राय कुछ माह पूर्व जब वर्धा में महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के कुलपति बने थे तो शै‍क्षणिक और हिंदी जगत में नई उम्‍मीदें बंधी थीं। पर अब उन पर पानी फिरता नज़र आ रहा है। पुलिस विभाग के ऊंचे पदों पर रहते हुए क़ानून की रखवाली करने वाले विभूति नारायण राय वर्धा में विश्‍वविद्यालय के नियम-कानूनों की लगातार अनदेखी कर रहे हैं।

विश्‍वविद्यालय के एक उच्‍चाधिकारी ने स्‍वीकार किया कि गत वर्ष नवंबर के शुरू में श्री राय ने महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के जनसंचार विभाग में अपने मित्र श्‍याम कश्‍यप को नियुक्‍त करने के लिए विश्‍वविद्यालय के अधिनियमों की पूरी तरह अनदेखी की। अधिनियम कहता है कि विश्‍वविद्यालय कार्य समिति (इ.सी.) में नियुक्ति के मसलों को रखा जाना और उसकी स्‍वीकृति लेना अनिवार्य है, लेकिन कश्‍यप की नियुक्ति पहले कर ली गयी और कार्य समिति की स्‍वीकृति बाद में ली गयी। कश्‍यप दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के हिंदी माध्‍यम कार्यान्‍वयन निदेशालय में उपनिदेशक पद से 31 अक्‍टूबर 2008 को रिटायर हुए और हफ़्ते भर में कुछ स्‍थानीय मित्रों को विशेषज्ञ के रूप में बुला कर उन्‍हें तीन वर्ष के लिए प्रोफेसर नियुक्‍त कर लिया गया। इस तरह एक नॉन टीचिंग कैडर को टीचिंग कैडर में लाया गया। कश्‍यप को जनसंचार विभाग का प्रोफेसर ही नहीं, विभागाध्‍यक्ष भी बना दिया गया और दो वर्ष से विभाग चला रहे अनुसूचित जाति से आने वाले प्राध्‍यापक धरवेश कठेरिया के सारे अधिकार छीन लिये गये। उन्‍हें लगातार प्रता‍ड़‍ित भी किया जा रहा है। इससे छात्रों और प्राध्‍यापकों में गहरा असंतोष है। कुलपति ने श्‍याम कश्‍यप को विश्‍वविद्यालय की शैक्षणिक परिषद में भी रख दिया, जबकि विश्‍वविद्यालय अधिनियम कहता है कि निश्चित अवधि के लिए नियुक्‍त व्‍यक्ति को शैक्षणिक परिषद में नहीं रखा जा सकता।

एक प्रोफेसर ने कहा, ‘जिस प्रक्रिया से निश्‍िचत अवधि (तीन वर्ष) के लिए कश्‍यप नियुक्‍त किये गये, उसी प्रक्रिया से साहित्‍य विभाग में हरिमोहन बुधौरिया और भाषा विद्यापीठ में उमाशंकर उपाध्‍याय की नियुक्ति हुई थी, फिर उन दोनों को विभागाध्‍यक्ष क्‍यों नहीं बनाया गया? कुलपति ने उन्‍हें भी शैक्षणिक परिषद में क्‍यों नहीं रखा?’

जनसंचार विभाग के छात्रों का कहना है कि श्‍याम कश्‍यप पढ़ा नहीं पा रहे हैं और कुलपति से इस बारे में शिक़ायत करने पर वे कुछ सुनना नहीं चाहते। विद्यार्थियों ने कुलाधिपति डॉ नामवर सिंह और संकाय की डीन डॉ. इलिना सेन से भेंट कर साफ-साफ कहा कि कश्‍यप पढ़ा नहीं पा रहे हैं, वे छात्रों में फूट भी डाल रहे हैं। नामवर सिंह ने छात्रों को भरोसा दिया है कि वे कुलपति से इस बारे में बात करेंगे। यही भरोसा गत माह कार्यसमिति के सदस्‍य प्रो कमला प्रसाद ने भी छात्रों को दिया था। पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

छात्रों में असंतोष कम करने के लिए श्‍याम कश्‍यप कई छात्रों को लेकर पूना फिल्‍म महोत्‍सव में चले गये। वहां जाने के लिए उस महोत्‍सव की तरफ से कोई न्‍यौता नहीं आया था। महोत्‍सव में जाने के लिए कुलपति ने 90 हजार रुपए मंजूर किये। कश्‍यप अपने चहेते छात्रों के साथ महोत्‍सव खत्‍म होने के बाद भी दो दिनों तक पूना में घूमते रहे।

यही नहीं, श्‍याम कश्‍यप अपने साथ ही दिल्‍ली के अजय सकलानी नामक लड़के को ले आये और उसे 20 हजार रुपये मासिक के वेतनमान में विभाग का टेक्‍नीकल एसिस्‍टेंट के पद पर नियुक्ति करवा लिया। इसके लिए बनी चयन समिति में खुद कश्‍यप थे और बाक़ी के दो लोग थे - प्रो वीसी और विशेष कर्त्तव्‍याधिकारी। संस्‍कृति संकाय की डीन से इस मामले में मशविरा तक नहीं किया गया। नियमानुसार विश्‍वविद्यालय कार्यसमिति की पूर्व स्‍वीकृति भी नहीं ली गयी।

एक प्रोफेसर ने आरोप लगाया कि कुलपति ने कश्‍यप को मनमानी करने की छूट दे रखी है। कुलपति खुद भी मनमानी कर रहे हैं। अभी-अभी ख़त्‍म हुई ‘हिंदी समय’ संगोष्‍ठी के लिए कार्य समिति की मंजूरी नहीं ली गयी। संगोष्‍ठी में आये अपने चहेते लेखकों - ममता कालिया, मैत्रेयी पुष्‍पा, देवीप्रसाद त्रिपाठी, भारत भारद्वाज, साधना अग्रवाल, एमएस सथ्‍यू, गोपीनाथन व उनकी पत्‍नी, अशोक वाजपेयी और विकास नारायण राय (कुलपति के भाई) को उन्‍होंने हवाई जहाज के टिकट दिये, तो दूसरे लेखकों को ट्रेन के एसी टू अथवा थ्री टियर के टिकट। इसे लेकर लेखकों में नाराज़गी है।

विश्‍वविद्यालय कार्यसमिति की सदस्‍य गगन गिल ने भी डॉ नामवर सिंह को पत्र लिख कर विभूति नारायण राय की अनियमितताओं को लेकर संतोष जाहिर किया है। अपने पत्र में गगन गिल ने लिखा है कि विश्‍वविद्यालय में तीन महत्‍वपूर्ण पत्रिका‍ओं का संपादन विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसरों से कराया जाना उचित था, पर विभूति ने अपने मित्रों को उपकृत करने के लिए संपादन का ज़‍िम्‍मा सौंप दिया। विभूति नारायण राय ने ‘बहुवचन’ का संपादन इलाहाबाद के राजेंद्र कुमार, सतीश जमाली और प्रकाश त्रिपाठी को सौंपा है, तो ‘पुस्‍तक वार्ता’ दिल्‍ली के भारत भारद्वाज और ‘हिंदी डिसकोर्स’ दिल्‍ली की ही ममता कालिया को। इसे लेकर विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापकों ने कुलपति की अनियमितताओं के मामले से राष्‍ट्रपति व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को पत्र लिख कर अवगत कराने का फैसला