
अरुण नारायण कम-उम्र नौकरी पेशा वाले युवा हैं, जिन्होंने बिहार विधान परिषद की सरकारी नौकरी पाने से पहले साहित्यिक पत्रकारिता में अपनी जगह बनाने की भरपूर कोशिश की। वे इस कदर आतंकित करने वाले पाठक हैं कि हर मुलाकात में दर्जनों नयी रचनाओं की फेहरिस्त आपके सामने रख देंगे कि ये पढ़ा या नहीं। वे हिंदी की ज्यादातर पत्रिकाएं पढ़ते हैं और नया ज्ञानोदय भी उनमें से एक है। ताज़ा संपादकीय विवाद को तूल दिये जाने को वे हिंदी के स्वार्थी मानस का मुज़ाहिरा बता रहे हैं। उन्होंने पटना से फोन पर हमें अपनी ये टिप्पणी लिखवायी और कहा कि हिम्मत है, तो इसे मोहल्ले में छापिए। हम उनकी टिप्पणी तो छाप ही रहे हैं - टिप्पणी में जिस स्नोवा वार्नो का ज़िक्र उन्होंने किया है, उस स्नोवा वार्नो से जुड़ी जानकारियों से भरी एक अखबारी कतरन के अंश भी यहां दे रहे हैं।
वर्ष की उपलब्धि हैं स्नोवा वार्नो
व्यतीत होते व्यतीत होते इस साल में कथा-साहित्य के क्षेत्र में वैसा आलोड़न नहीं दिखा, जैसी उम्मीद थी। वैसे भी मैं बाहर की कहानियां पढ़ता नहीं, क्योंकि ‘हंस’ में ही पर्याप्त कहानियां आ जाती हैं। इस साल जिस कथाकार ने मुझे बेहद प्रभावित किया, वह स्नोवा वार्नो हैं। ‘हंस’ में इस साल हमने उनकी तीन कहानियां छापी हैं। वह अद्भुत कथाकार हैं। हालांकि वह पहले से चर्चित नहीं हैं। आपको भी स्नोवा वार्नो की कहानियां जरूर पढ़नी चाहिए।
राजेंद्र यादव, संपादक, हंस
कौन है स्नोवा वार्नो?
स्नोवा वार्नो क्या कोई फर्जी लेखिका (लेखक) हैं? कुछ लोग ऐसा ही मानते हैं। साहित्य के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। हां, यह जरूर है कि पहली बार नाम बदलकर कहानी लिखने के पीछे कोई ठोस वजह नहीं दिखाई देती। लेकिन स्नोवा वार्नो की लोकप्रियता का पता पाठकों की चिटि्ठयों से तो चलता ही है। बातचीत के दौरान खुद राजेंद्र यादव ने कहा कि हंस के वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी संजीव (प्रसिद्ध कथाकार) स्नोवा वार्नो से मिलने के इच्छुक हैं, लेकिन मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने चंद्रधर शर्मा गुलेरी को देखा है? कथाकार और अंतिका प्रकाशन चलाने वाले गौरीनाथ का कहना था कि स्नोवा वार्नो के नाम से एक लेखक कहानी लिख रहा है। कुछ साहित्यकार जब स्नोवा वार्नो से मिलने शिमला गए, तो उन्हें बता दिया गया कि वह ऑस्ट्रेलिया चली गई हैं। शिमला के साहित्यकार एस आर हरनोट तो इसे साहित्य में आतंकवाद का मामला कहते हैं। उनकी शिकायत है कि कुछ लोग स्नोवा का नाम चलाकर उसकी कमाई खा रहे हैं। हरनोट ने स्नोवा वार्नो की नागरिकता के बारे में जानकारी केलिए राइट टु इनफॉरमेशन में आवेदन कर रखा है। वह इस पर भी आक्रोश व्यक्त करते हैं कि कुछ दिग्गज साहित्यकार-आलोचकों ने बगैर जाने स्नोवा वार्नो को महान रचनाकार करार दिया है।
साभार: अमर उजाला
अभी हिंदी का बौद्धिक संसार नया ज्ञानोदय के संपादकीय को लेकर चिंतित है। ज्ञानोदय के उस संपादकीय को विवादास्पद के विशेषण के साथ जनसत्ता ने ओपेन किया है। लोग उसके पोस्टमार्टम में लगे हैं। पिछले हफ्ते राजकिशोर ने कालिया के संपादकीय में निहित मंशा को सार्वजनिक किया। इस क्रम में उनकी खुद की भी कुंठाएं उजागर हुईं। और इस बार गगन गिल ने तो उसकी रही कसर भी पूरी कर डाली। इस प्रकरण से एक साथ कई बातें उभरती हैं। एक तो यह कि हिंदी लेखन का वर्तमान इतना संकीर्ण और वैयक्तिक हो गया है, वहां व्यक्तिगत राग-द्वेष में ही लेखकों की सारी ऊर्जा जाया हो रही है। इसमें हो ये रहा है कि कोई भी प्रवृत्तिगत या सृजनात्मक मूल्य विकसित नहीं हो पा रहे।
दूसरी महत्वपूर्ण बात इस संदर्भ में मुझे जो लगती है, वह यह है कि जिस अखबार ने इस बहस को उछाला है, उसकी भी मंशा वैयक्तिक राग-द्वेष से ऊपर नहीं आ पायी है। संपादक में अगर थोड़ी-सी भी सलाहियत होती तो वे रवींद्र कालिया की इस हरकत को व्यापक परिप्रेक्ष्य में उठा सकते थे। जिसे हिंदी के चंद बौद्धिक विवादास्पद कह कर आक्रोश जाहिर कर रहे हैं, उसकी वह मंशा आम पाठकों ने बहुत पहले ही भांप ली थी। लेकिन शायद उसने हिंदी के पावर केंद्रों की नीयत और नियति, दोनों को अच्छी तरह से भांप लिया था, इसलिए वह उस पर मौन रहा।
ओम थानवी, राजकिशोर और के विक्रम राव (राव साहब का लिखा यहां देखें) और गगन गिल आज जिस तरह से रवींद्र कालिया के पीछे पड़े हैं, वे इसके पहले मौन क्यों थे, जब आज से कुछ ही माह पूर्व स्नोवा वार्नो प्रसंग पर ज्ञानोदय के अंतिम पन्ने पर नामवर सिंह, राजेंद्र यादव और परमानंद श्रीवास्तव की तस्वीर लगा कर ‘स्नोवा वार्नो आवाज दो, तुम किधर हो’ की संस्कृति फैला रहे थे, उस समय कहां गया था इन प्रगतिशील बुद्धिवादियों का विवेक? यही कालिया जब विजय कुमार के बारे में फूहड़ टिप्पणियां लिखवा रहे थे और वैश्वीकरण के समर्थन में संपादकीय लिख रहे थे और साथ ही नये कथाकारों के परिचय में अश्लील विशेषणों की दुर्गंध उड़ेल रहे थे, तो उस समय विरोध का यह स्वर क्यों नहीं उभरा। इस प्रसंग में मुझे एक कहावत याद आ रही है। वह कहावत इस बौद्धिक जमात की मतलबपरस्ती को शुद्ध रूप में उभारती है। कहावत है, अपना पर परे तो उपला बिछे चले।
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