
अंशुमाली रस्तोगी
यह होती है बहस की उत्तेजना! हमने अभी सुबह ही मोहल्ले पर नया ज्ञानोदय के एक संपादकीय पर राजकिशोर जी की प्रतिक्रिया से आपलोगों को वाकिफ करवाया... और कुछ ही घंटों के भीतर बरेली से अंशुमाली जी ने यह लंबा चिट्ठा हमें मेल कर दिया। उनका कहना ये है कि संपादक की विचारशून्यता को उसी रूप में रेखांकित करने वालों की जमात भी दरअसल कितनी विचारशून्य और शातिर अहंम्मन्यता से भरी हुई जमात है। कुछ उन्हीं शब्दों में कि मीडियॉकर शब्द का प्रयोग प्राय: मीडियॉकर लोग ही अधिक करते हैं।
नया ज्ञानोदय के विवादास्पद संपादकीय और राजकिशोर की टिप्पणी को पढ़ कर बहुत देर तक मैं यही सोचता रहा कि यहां जिस मुद्दे पर बहस की जा रही है, क्या यह वाकई बहसतलब है या फिर एक-दूसरे से हिसाब-किताब निपटाने की खुन्नस! इस बहस को पढ़ कर लगता रहा कि हिंदी साहित्य में अब बहस के मुद्दे ख़त्म हो चुके हैं क्योंकि हमारे महान-साहित्यकारों को अपनी-अपनी खुन्नसें निपटाने से ही फुर्सत नहीं मिलती। फिर साहित्य और समाज पर बात क्या होगी!
पहले बात करते हैं, रवींद्र कालिया के तथाकथित विवादास्पद संपादकीय की। दरअसल, संपादकीय में रवींद्र कालिया ने खुद के जीनियस होने को जस्टीफाई किया है; दूसरे जीनियस लेखकों के साथ। ऐसा करना-करवाना कालियाजी की फितरत में शुमार रहा है। कालियाजी ने अपनी जीनियसगीरी पहले वागर्थ में दिखायी, अब नया ज्ञानोदय में दिखा रहे हैं। उनकी जीनियसगीरी का कमाल देखिए दोनों ही पत्रिकाओं में अपने गुट और अपनी पसंद के युवा लेखकों को छापकर उन्हें प्रेमचंद से महान बनाने की कोशिश तो की, परंतु दाल गल नहीं पायी। आज उनके प्रिय लेखक-कहानीकार कहां हैं, कोई नहीं जानता।
कालियाजी का मत है कि मात्र दाढ़ी बढ़ा लेने या जींस पहन लेने से कोई जीनियस नहीं हो जाता। बेशक, उनकी स्थापना अपनी जगह सही हो सकती है। यूं तो जीनियस संघर्ष से ही बनते हैं। लेकिन बदलते वक्त और बदलते परिवेश के साथ जीनियस होने-बनने व कहलाने के मायने भी बदल गए हैं। आज वो व्यक्ति जीनियस है, जो संबंधों की गर्मी को हर वक्त बरकरार रखना जानता हो। कहीं और तो नहीं मगर हां, हिंदी साहित्य के विषय में मैं यह दावे के साथ कह-लिख सकता हूं कि यहां वो ही लेखक-साहित्यकार जीनियस होने का दर्ज पा सकते हैं, जिन्होंने संबंधों की गर्मी को तरोताजा रखा है। संबंधों और जुगाड़ के औजार के सहारे यहां हर लेखक-साहित्यकार जीनियस हो-बन सकता है। ऊपर से अकादमिक व गैर-अकादमिक सम्मान-पुरस्कार उसके जीनियस होने के चरित्र पर ठप्पा लगा देते हैं।
कालियाजी ने जिन चार जीनियसों भुवनेश्वर, निराला, मुक्तिबोध, उग्र के नामों उल्लेख किया - ये सब यूं ही जीनियस नहीं हो गये। इन लेखकों ने जीनियस होने-बनने के लिए जीवन में बहुत संघर्ष किया था। उन्होंने जो जीवन जिया या जिन संघर्षों का सामना किया, क्या रवींद्र कालिया या उन जैसे अन्य लफ्फबाज साहित्यकार-लेखक क्या आज ऐसा कर सकते हैं? शायद कभी नहीं। हकीकत तो यह है कि दिल्ली के साहित्यकार और दिल्ली में बाहर से आये हुए साहित्यकार बिना कोई संघर्ष किये ही खुद को जीनियस की श्रेणी में बड़ी होशियारी से रख-रखवा लेते हैं। इस काम में उनके चेले बहुत काम आते हैं। यहां तो नामवर सिंह से लेकर राजेंद्र यादव तक हर कोई अपनी-अपनी तरह और अपने-अपने स्वभाव का जीनियस है। अब प्रेमंचद, मुक्तिबोध, निराला जैसे असली जीनियस इन स्वयंभू जीनियसों के सामने भला क्या बेचते हैं?
कालियाजी जीनियस वो भी होते हैं जो अधिकारी होते हैं। हमारे हिंदी साहित्य की तो यह परंपरा-सी रही है कि इसने हमेशा उन साहित्यकारों-लेखकों को ही जीनियस माना-स्वीकार किया है, जो अधिकारी वर्ग से आते हैं। साहित्यिक अधिकारीनुमा जीनियसों से हमारा हिंदी साहित्य खासा प्रभावित रहा है। यहां तो आपको हर बड़ा कवि-कहानीकार अधिकारी या फिर उसके समकक्ष ही मिलेगा। जय हो साहित्यिक अधिकारियों की! जय हो स्वयंभू जीनियसों की! हां, रही बात अचूक अवसरवादी की। तो अचूक अवसरवादी शब्द की सच्ची तस्वीर अगर आपको देखनी हो, तो स्वयं रवींद्र कालिया में बेहतर देखी जा सकती है।
अब बात करते हैं, राजकिशोर की बेहद सभ्यता-शुचितायुक्त टिप्पणी की। मेरे ख्याल से राजकिशोरजी को दूसरों को भाषाई तमीज सिखाने का एक विभाग अब खोल ही लेना चाहिए। राजकिशोरजी लिखते हैं, कुछ दिनों से मैं इस मत का कायल हूं कि किसी व्यक्ति विशेष के लिए कटु शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इससे कोई फायदा नहीं होता बल्कि उलटे नुकसान होता है। मुझे उनकी यह कुछ दिनों वाली बात पल्ले नहीं पड़ी। क्या कुछ दिनों से पहले वे अपने मत और सोच के साथ सोये हुए थे? क्या कालियाजी के संपादकीय को पढ़ कर ही वे जागे हैं? राजकिशोरजी बड़ी अजीब बात है - आप किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ कैसे भी शब्दों का प्रयोग करने को स्वतंत्र हैं, मगर जब कोई दूसरा उसी लहजे में अपनी बात को कहता-लिखता है, तब उसके शब्द आपको कटु लगते हैं। उन कटु शब्दों में आपको नुकसान नज़र आता है। यानी मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू। मान्यवर, असहमति में भाषा और शब्द कटु हो ही जाते हैं। अब यह निर्भर उस व्यक्ति विशेष पर करता है कि वो उन शब्दों-असहमति को कैसे लेता है? रही बात गालियों की, तो गालियां जब समाज का हिस्सा हो सकती हैं फिर उनके साहित्य का हिस्सा बनने या बने रहने में आपको क्यों आपत्ति है? बंधु, आज साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में जिस प्रकार की भाषा में कहानियां लिखी जा रही हैं, वो तो किन्हीं गालियों से भी ज्यादा अश्लील और बदतर हैं। उन पर आपका क्या मत है? आपको शायद मालूम नहीं, गालियां भी व्यक्तियों की तरह जीनियस होती हैं। क्योंकि न भूलें, गालियां हम व्यक्तियों की ही देन हैं।
राजकिशोरजी को लगता है लोकतंत्र से बेहद प्यार है। लेकिन वे जिस लोकतंत्र की बात करते हैं उस लोकतंत्र में सबकुछ लिखने-कहने के लिए सिर्फ वे ही स्वतंत्र होना-रहना चाहते हैं। लोकतंत्र-लोकतंत्र चिल्लाकर शायद वे खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा जीनियस घोषित करवाना चाहते हैं। बधाई राजकिशोरजी, बधाई। कम से कम मेरा राजकिशोर के लोकतंत्र में न रत्तीभर विश्वास है, न ही आस्था। मान्यवर यह कैसा लोकतांत्रिक लेखकीय समाज है, जहां शैलेश मटियानी के पास प्रगतिशील इसलिए नहीं फटकना चाहते थे, क्योंकि वे राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक थे? यह कैसा लोकतांत्रिक लेखकीय समाज है, जिसने तस्लीमा नसरीन को अलग-थलग छोड़ दिया? जहां स्त्री-विमर्श के नाम पर देह और दलित विमर्श के नाम पर यादवों-सिहों-ठाकुरों का राज चलता है? राजकिशोरजी यह लोकतंत्र नहीं, संबंधतंत्र है।
राजकिशोरजी की बड़ी भारी चिंता है कि इस समय हिंदी लेखकों में एक भी जीनियस नजर नहीं आता। लेकिन मुझे तो आता है; राजकिशोर और रवींद्र कालिया। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों के महा-जीनियस हैं। जिस जीनियस को एक अखबार में लिखने की हफ्ते में कितनी ही बार छूट हो। जिस जीनियस के हर बड़ी और खास पत्र-पत्रिकाओं में नियमित स्तंभ छपते हों। जिस जीनियस के पास एक बड़े प्रतिष्ठान की संपादकीय गद्दी हो। जिस जीनियस ने कितने ही युवा-कहानीकारों को प्रेमचंद और रेणु से भी बड़ा बना दिया हो। जिस जीनियस के पास बड़ी व प्रतिष्ठित कहानीकार होने की पदवी हो, भला ऐसे जीनियसों को यहां कौन नहीं महा-जीनियस स्वीकार करेगा। तो राजकिशोरजी इस चिंता को अपने दिल-दिमाग से बाहर निकाल दीजिए कि हिंदी लेखकों में एक भी जीनियस नहीं है। यहां हर पहुंचवाला लेखक-साहित्यकार जीनियस ही नहीं, बल्कि महा-जीनियस है।
मेरा बस एक ही दुख है कि ये तमाम पहुंचवाले महा-जीनियस लेखन में समाज और जन की बात नहीं, सिर्फ अपनी और अपनों के हितों की ही बातें करते-लिखते हैं। उसका कारण है, दरअसल, ये सभी समाज और जन से कटे हुए महा-जीनियस हैं।
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