कवयित्री, लेखिका गगन गिल ने ये टिप्पणी जनसत्ता के लिए लिखी। नया ज्ञानोदय से जुड़े ताज़ा विवाद का मोहल्ला में सार्वजनिक होना कई लोगों को इसलिए भी खटका, क्योंकि वे इस विवाद को साहित्यकारों की असामाजिक गतिविधियों के रूप देख रहे हैं। पटना से एक दोस्त ने फोन किया कि तब किसी लेखक ने कोई आपत्ति क्यों नहीं जाहिर की, जब रवींद्र कालिया ने पूंजीवाद के समर्थन में संपादकीय लिखा। इन तमाम संशय और सवालों के बीच हम इस बहस में इसलिए भी दिलचस्पी ले रहे हैं कि हम वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच होने वाली गुफ्तगू जैसी चीजों की गंभीरता समझ सकें। वे किन मुद्दों और किन सवालों से टकराने में अपना ज़्यादा वक्त लगाते हैं। बहरहाल, गगन गिल की ये टिप्पणी हमें बताती है कि सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़ा स्टैंड लेने वाले एक अफसर लेखक की दिलचस्पी भारत भारद्वाज जैसे सांप्रदायिक शख्सियत में किस कदर है या क्षेत्रवाद को लेकर वो कितना आग्रही है। निर्मल वर्मा से उनके कुछ वायवीय मतों के चलते किस हद तक वे नफरत करते हैं। लिहाजा जिस विश्वविद्यालय का वर्तमान उन्हें सौंपा गया है, वे उसमें से भविष्य का कैसा मोती निकाल पाएंगे - इसे सहज ही समझा जा सकता है। पेश है, गगन की टिप्पणी, जो जनसत्ता में अपने-अपने पुरुषार्थी शीर्षक से रविवार, 18 जनवरी 2009 के अंक में छपी।
‘नया ज्ञानोदय’ के अशोभनीय संपादकीय पर राजकिशोर की टिप्पणी (जनसत्ता, 11 जनवरी) कहती है कि रवींद्र कालिया के निशाने पर इस बार “संभवत: नीलाभ, अशोक वाजपेयी, गगन गिल आदि” हैं।
कुछ चीजें बहुत साफ होती हैं। मसलन ‘दारूकुट्टा’ या ‘रसरंजन’ शब्दों के चलन के लिए कौन लेखक जिम्मेवार है। या यह कि, हम सहमत हों न हों, ‘अचूक अवसरवादी’ विशेषण किनके लिए रूढ़ है। फिर भी मुझे पता चला है कि ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी आलोक जैन की जवाबतलबी पर उनके संपादक ने साफ पल्ला झाड़ लिया कि उनका आशय उन लेखकों से नहीं, जिनका कयास लगाया जा रहा है। मैंने आलोकजी को फोन किया था। अब रवींद्र कालिया ने मुझे पत्र लिख कर कहना चाहा है कि ‘नामी-गिरामी की बेवा’ से आशय मुझसे नहीं था। फिर किससे था?
मैं इस विवाद को जाहिर नहीं करना चाहती थी। मगर इस अप्रिय प्रसंग में एक नहीं, दो-दो प्रतिष्ठित संस्थानों की गिरावट नुमाया है। इस गरज से एक वाकये का ब्योरा देना मुनासिब जान पड़ता है।
घटना का सार: राष्ट्रपति ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद में जिन लेखकों को मनोनीत किया, उनमें एक मैं भी हूं। हमशहरी होने का ही कारण नहीं है, विश्वविद्यालय के नये कुलपति विभूतिनारायण राय कालिया दंपति के अभिन्न मित्र हैं। कालिया भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक भी हैं। राय ज्ञानपीठ पुरस्कार की निर्णायक समिति में लिये गये। इसके बावजूद कि साहित्य में उनकी क्या जगह है, सब जानते हैं। अब राय ने कुलपति के नाते विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पत्रिका के संपादक पद पर रवींद्र की पत्नी ममता कालिया को नामजद कर दिया। मैंने इसका विरोध करते समय ममता कालिया को मीडियाकर बताया। और आप देख सकते हैं, वह जुमला ‘नया ज्ञानोदय’ के पन्नों तक चला आया। साथ में ‘बेवा’ भी। एक संपादकीय से मित्र और पत्नी दोनों का हिसाब चुकता करने का जुगाड़ हुआ। जैसे ज्ञानोदय ज्ञानपीठ की नहीं, कोई जेबी पत्रिका हो।
यह बात 7 दिसंबर की है। वर्धा में हिंदी विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक शुरू होने से ठीक पहले की। नये कुलपति से दिल्ली-वर्धा में तीन-चार बैठकें हो चुकी थीं। विभूति उत्साही जीव थे और एक ‘परेशान आत्मा’। परेशान इसलिए कि ममता कालिया के मुद्दे पर मुझे राजी करने वे राजधानी में मेरे घर आये थे। मुझे विश्वविद्यालय के दो प्रकाशनों ‘पुस्तक चर्चा’ और अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘हिंदी’ - के संपादक पद के लिए उनके द्वारा चुने गये नामों - भारत भारद्वाज और ममता कालिया - पर एतराज था। मेरा मत था कि उक्त जिम्मेवारी के लिए दोनों नाम उपयुक्त नहीं हैं। भारत भारद्वाज खेमेबाजी में उलझते रहे हैं और ममताजी ने अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन भले किया हो, अंग्रेजी पत्रिका का संपादन आज की अंतर्राष्ट्रीय, मुहावरेदार अंग्रेजी में कर पाना उनके लिए मुश्किल होगा। मुझे यह भी फिक्र थी कि हिंदी-अंग्रेजी की अनंत खाई में एक नयी ज़मीन तोड़ने के लिए जिस तरह के बौद्धिक एडवेंचर का स्वभाव चाहिए, उसका कोई परिचय अभी तक ममताजी के लंबे साहित्यिक जीवन से नहीं मिला था।
मैंने अपनी ओर से इस कार्य के लिए आलोक भल्ला और हरीश त्रिवेदी का नाम सुझाया। प्रो भल्ला की हिंदी-उर्दू से अंग्रेजी अनुवाद में गति है, देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में उन्होंने पढ़ा, पढ़ाया है। समकालीन आलोचकीय मुहावरे पर भी पकड़ है। उनकी अनुवाद और आलोचना पुस्तकें हार्पर कॉलिंस, ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस जैसी जगहों से छपी हैं। प्रेमचंद, इंतज़ार हुसैन, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, विभाजन के साहित्य पर उनका काम बेहतरीन है। हैदराबाद के सीआईएफएल से रिटायर होने के बाद जामिया मिलिया में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी राय के अपने शहर इलाहाबाद के हैं। मैंने सोचा, आलोक से नहीं तो हरीशजी की प्रतिभा और गुण से वे ज़रूर वाकिफ होंगे। राय उनसे भी कोरे थे। (मुझे नहीं मालूम, आलोक भल्ला या हरीश त्रिवेदी इस जिम्मेवारी के लिए राजी होते या नहीं। दोनों को इस विवाद की और उनके नामों के प्रस्ताव की जानकारी शायद इस लेख से ही मिलेगी।)
अब कुलपति का रवैया। वे कार्यपरिषद की 6 नवंबर को दिल्ली में हुई पहली मीटिंग में ही बजिद थे कि उन्हें कार्यपरिषद अग्रिम तौर पर अधिकृत करे कि वे जिसे सही समझें संपादक बना कर ले आएं, कार्यपरिषद कार्योत्तर इसकी पुष्टि कर दे। बैठक में कार्यपरिषद ने उन्हें यह अधिकार दे दिया। कार्यपरिषद की अगली बैठक (7 दिसंबर) में इस अधिकार की पुष्टि होनी थी। क्योंकि इस बीच अनौपचारिक रूप से कुलपति की ओर से ये दो नाम आ चुके थे, मुझे कुलपति की नीयत पर संदेह हुआ। (स्पष्ट कर दूं कि उनके द्वारा घोषित दोनों नाम अब तक कार्यपरिषद में अनुमोदनार्थ आये नहीं हैं।)
सवाल यह नहीं था कि इन जिम्मेवारियों के लिए कौन अधिक उपयुक्त होता। वह बहस तो हुई ही नहीं। सवाल यह हे कि एक विश्वविद्यालय जो विकट परिस्थितियों से निकला है, उसके बेहतर प्रदर्शन के लिए हम कार्यपरिषद के सदस्य आपसी विमर्श से बेहतरीन लोगों को विश्वविद्यालय से जोड़ सकते हैं या नहीं?
जिस ‘मीडियॉकर’ शब्द की विवेचना ‘नया ज्ञानोदय’ के सुधी संपादक ने अपने विवादास्पद संपादकीय में की है, कहना न होगा उसका प्रयोग मैंने ममताजी के अंग्रेजी पत्रिका का संपादन करने की काबिलियत के संदर्भ में किया था, किसी अवमानना या आक्षेप के रूप में नहीं। आज अंग्रेजी मुहावरे में अपनी बात रखने की हमारी जो मुश्किलें हैं, उनके संदर्भ में। क्या इससे हिंदी समाज में ममताजी की लेखकीय जगह कम हो जाती है?
7 दिसंबर की दोपहर जब मेरे और कुलपति के बीच अनौपचारिक बातचीत चल रही थी, मैंने उनके प्रस्तावित संपादकों पर अपनी राय दोहरायी थी। मैं विश्वविद्यालय में मध्यमार्गी विचारों के लिए गुंजाइश रखने की बात पहले कर चुकी थी। चंद दिनों के परिचय में ही मुझे उनकी कट्टरता और क्रूरता का आभास मिल चुका था। छात्राओं ने वहां मौका मिलते ही उनकी शिकायतें की थीं। (एक छात्रा, जिससे हॉस्टल को लेकर विवाद था, वह ‘डंडे मार कर बाहर करने’ की बात कह चुके थे!)
अचानक कुलपति ने बिना किसी प्रसंग के कहा, ‘निर्मल जी ने तो बाबरी मस्जिद का समर्थन किया था!’ यह मुझे चुप करने का छिछला प्रयास था। अगर उन्हें मेरा प्रतिरोध करना था, तो उन्हें ममता कालिया या भारत भारद्वाज की योग्यता के पक्ष में तर्क रखना चाहिए था। उन्होंने अपना पक्ष रखने के बजाय मेरे पति पर प्रहार किया। तब जब वे इस संसार में नहीं हैं।
फिर भी मैंने उन्हें कहा, ‘निर्मल जी ने अपने जीवन में ऐसे दुष्प्रचार को बहुत झेला था, इसी से कह रही हूं कि बौद्धिक विमर्श में ग्रे एरिया की गुंजाइश हमेशा रहनी चाहिए,’ फिर मुझे याद आया और मैंने बताया कि उस समय तो हम हारवर्ड में थे।
‘उससे क्या होता है? समर्थन कहीं से भी किया जा सकता है!’ वे पुलिसवाले थे। मुझसे बेहतर जानते होंगे, ‘वे हिंदुत्ववादी थे!’
‘तो? मैं भी हूं, और सिख और बौद्ध भी हूं...’
‘उन्होंने विहिप का समर्थन किया था...’
‘कब?’
‘मैं उनकी टिप्पणियां दिखा सकता हूं’, वे लगभग हिंसक मुद्रा में थे।
‘आपको मालूम होना चाहिए, निर्मल वर्मा नोबेल पुरस्कार के लिए इस देश के आधिकारिक तौर पर नामित लेखक थे, तब इस देश में मनमोहन सिंह की सरकार थी।’
‘तो आप यूपीए को बेहतर मानती हैं?’
सब जानते हैं, निर्मल जी के विचारों को भले हिंदुत्व के खाते में डाल दिया गया हो, उन्होंने किसी राजनीतिक पार्टी के हित में बात नहीं की। लेकिन अगर करते तो क्या इस लोकतंत्र में उन्हें इसका हक नहीं था? क्या इससे उनकी रचनाएं कमज़ोर पड़ जातीं?
यह बातचीत हम दो लोगों के बीच भोजन पर हुई। कार्यपरिषद के अपने दो साथियों, प्रो कमला प्रसाद और विनोद कुमार शुक्ल को इस लज्जाजनक प्रसंग की जानकारी मैंने वर्धा से लौटते समय रास्ते में दी। असगर वज़ाहत को वहीं, कार्यपरिषद की मीटिंग शुरू होने से पहले। बाक़ी तीन नामित सदस्य - विष्णु नागर, अरविंदाक्षन और मधुकर उपाध्याय - अनुपस्थित थे। कहना न होगा कि सभी इसे सुन कर सन्न और स्तब्ध थे। इसलिए और भी कि लगभग तीन वर्ष के कार्यकाल में हमारे संवाद में कभी किसी की विचारधारा का प्रभाव या उसका अभाव आड़े नहीं आया था।
लेकिन जाने क्यों, वर्धा से लौटते समय आशंका साथ चली आयी कि अभी कुछ और शर्मनाक होगा। ‘नया ज्ञानोदय’ की टिप्पणी में ‘मीडियाकर’ शब्द पढ़ते ही मैं ताड़ गयी। ‘बेवा’ शब्द तो बहुत आगे जाकर सामने आया। पढ़ कर कालिया का कम, मुझे कोतवाल कुलपति का खयाल ज्यादा आया। उन्हें आये जुम्मा-जुम्मा पांच हफ्ते हुए थे और अपने ही विश्वविद्यालय के प्रथम और दिवंगत कुलाधिपति पर उन्होंने ऐसा क्रूर हमला किया। शालीनता और प्रोटोकॉल को ताक पर रख कर!
अब बाबरी मस्जिद हादसे पर निर्मलजी का रुख। हादसे के तीन दिन बाद उन्होंने हारवर्ड डायरी में लिखा था -
(9 दिसंबर, 1992)
तीन दिन पहले अयोध्या की मस्जिद ढहा दी गयी। कभी-कभी रात को नींद खुल जाती है और लगता है, यह एक दुस्वप्न है, जो बीत जाएगा और यह भाव और भी भयंकर लगता है, कि मैं सो नहीं जाग रहा हूं और यह असलियत है, ख्वाब नहीं।
क्या डर का यथार्थ यह होता है?
भारत से जो ख़बरें आती हैं, उनका डिप्रेशन अलग है। भोपाल, बंबई... जब मैं सोचता हूं, कैसे लोगों को उनके घर से घसीट कर मारा जाता है, तो यह कल्पना ही असहनीय लगती है। उस भयावह यथार्थ के सम्मुख ‘धर्म’ जैसी चीज कितनी काल्पनिक जान पड़ती है। (‘धुंध से उठती धुन’, 1996)
यह उद्धरण निर्मल जी के जाने के बाद कई संस्मरणों में उद्धृत किया गया। हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित ‘निर्मल विमर्श’ के पृष्ठ चालीस पर भी इसका उल्लेख है। क्या कुलपति निपट अपढ़ हैं? या अपनी पसंद के संपादक लाने के फेर में सब सीमाएं लांघ गये हैं।
इस बीच मैंने कुलाधिपति डॉ नामवर सिंह को इस दुर्भावनापूर्ण प्रसंग की जानाकारी दी। मैंने लिखा कि कुलपति इस दुर्भावनापूर्ण असत्य टिप्पणी के लिए माफी मांगें, अन्यथा में कार्यपरिषद से अलग हो जाऊंगी। कुलपति ने इधर ‘नया ज्ञानोदय’ से निशाना लगवाया, उधर मुझे खेद का पत्र भिजवाया, यह कहते हुए कि हमारा ‘बौद्धिक विमर्श’ कार्यपरिषद से बाहर घटित हुआ था। क्या अनौपचारिक विमर्श में उन्हें अशोभनीय व्यवहार का लाइसेंस मिल जाता है?
और अंत में फिर ‘नया ज्ञानोदय’, जो इस विवाद में शाम के अखबारों की मुद्रा में चरित्र-हनन पर उतर आया है। यह वह ज्ञानपीठ नहीं, जिसे मैंने एक लंबी लड़ाई जीतने के बाद निर्मल साहित्य की अमूल्य निधि सौंपी थी, केवल आलोक जी की सज्जनता के कारण। यह अपमान नहीं, विश्वासघात है।
अब निर्णय तो भारतीय ज्ञानपीठ को करना है कि कालिया जैसे पुरुषार्थी के हाथों ज्ञानपीठ की मर्यादा और ज्ञान की रही-सही सामग्री विलुप्त करवानी है या नहीं। कि ज्ञानपीठ पुरस्कार के निर्णायक-मंडल जैसी उजली जगह पर विभूतिनारायण राय जैसी संशयात्मा उन्हें चाहिए कि नहीं।